Friday, November 4, 2011

विकलाँग श्रद्धा के अनुभव

तिरुमला की पहाड़ियों पर
है बालाजी का स्वर्णमंडित घर
fहंदी की सेवा में पहुँचा बालाजी के द्वार
अखिल भारतीय संगोष्ठी रखी गई थी वहाँ
ताकि अवश्य पहुँचें fहंदी-सेवी
विदेश यात्राओं से लेकर, हिल स्टेशनों, महानगरों
पर्यटन स्थलों पर आयोजन विवशता हैं
fहंदी की दिशा और दशा पर
सम्भव हो पाती हैं
ऐसी ही कुछ जगहों पर बहसें और बातें
जहाँ दिशाहीन और दुर्दशा को प्राप्त
प्रशासनिक अधिकारी एकत्र होकर
कोसते हैं, सरकार, संसद और संविधान को
दरअसल सब अब बधियाये बैल हैं
व्यवस्था में जुते, लतियाये
खुजलाते हैं एक-दूसरे की ख़ाज
मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा
इसी सिलसिले में था बालाजी में
बटोरने कुछ राष्ट्रीय पुरस्कार
उम्र के तकाजे़ में शुरू नहीं हो गया
तीर्थ यात्राओं का सिलसिला
मेरे माक्सZवादी कवि और आलोचक मित्र
न हों कृपया किसी गलतफ़हमी के आसान शिकार

तिरुपति विमानतल पर होटल तक जाने
की गई टैक्सी के चालक से शुरू हुई बातें
कहा मैंने
भाई हरि, तुम तो रहते-बसते हो तिरुपति में
तुम्हारी दिनचर्या में शामिल होगा
सानिध्य बालाजी का
धर्म की राजधानी में बसने का ईनाम
दर्शन रोज का काम

धीरे से कहा उसने
गंगा के किनारे रहने-बसने वालों के लिये
क्या कम हो जाती है गंगा की महिमा
क्या उन्हें भी नहीं होता होगा
गंगा स्नान का वही स्फुरण
वही जो कन्याकुमारी और काश्मीर से
जलपाईगुड़ी और जोधपुर से
काशी स्नान करने वालों को होता होगा

थोड़ी ख़ामोशी के बाद कहा उसने
शाम को चलिये तिरुमला
आज ही कर लीजिये दर्शन
टालिये मत कल-परसों पर
हवाई-यात्रा में क्या थकान
आज विशेष दिन है

पूछा मैंने
क्या विशेष दिन है आज
कहा उसने बड़ा सौभाग्य है आपका
गुरुवार को ही होते हैं नेत्र दर्शन
वह भी साँध्य समय
याने बिना ऋंगार के करिये दर्शन प्रभु जी के
सर्वांग दर्शन, बिना सजे-धजे
बिना सोने और फूलों से लदे
अपनी रचना मानव जैसे
सामान्य बाला जी के दर्शन

दर्शन की टिकट का टोटा पड़ गया
किसी कीमत पर
सम्भव नहीं हो रहा था प्रवेश पाना
काम आई विकलांगता, शायद पहली बार
बिना ज़ेब ढीली किये
प्राथमिकता से मैं पहुँच गया अंदर
यह जुगत बताई थी टैक्सी वाले हरिभाई ने
अच्छा सेल्स्मैन था वह तिरुपति का

लगा सोचने मैं
वे बाहर से प्रस्तर के हैं
और मैं भीतर से
मेरे भीतर का प्रस्तर लगा था पिघलने
अनुभूत कर लाखों लोगों की श्रद्धा असीम
याद आने लगे जैनेन्द्र कुमार
और उनकी रचना ‘रामकथा’

फर्श के पत्थर चिकने हो गये थे
भक्तों की चरण-रज से
याद आये बरबस
बड़े कवि विनोद कुमार शुक्ल
जिन्होंने देखे थे राजिम में
ठहर गये राजीव लोचन के
घिसे हुये पँजे पैरों के
भक्तों ने अपने सिरों से
चिकने कर दिये प्रभुओं के पाँव

कहीं नहीं लिखा था ‘छूना मना है’
भित्तियों पर उकेरी मूर्तियों पर फेरा हाथ मैंने
मिलाये वस्तुतः उन शिल्पियों से हाथ
जिन्होंने सजाया था
ईश्वर के इस घर को
अपनी बेजोड़ कला और अथक् परिश्रम के साथ
सोने के पत्तरों में छिप गये होंगे
उनके स्वेद-कण
चमकते होंगे आज भी नायाब मोतियों से
सोने के पार देखने की
जब ताब होगी मेरी आँखों में
दिख पड़ेंगी वे, अनमोल पसीनों की बूँदें

अपार जनसैलाब
जैसे समुद्र पर पछाड़ खा रही हों लहरें
सन्यासियों के लघु संस्करणों जैसे
छोटे-छोटे बच्चों के घुटे सिर
उन्हें सम्भालती माँयें
भीड़ के थपेड़ों पर बहती माँयें
उतनी ही सतर्क थीं
जैसे रक्खी हुई हों उनको
अभी भी गर्भ में

जय जयकारों के बीच
भावों के थपेड़ों पर बहता
पहुँचा मैं बिल्कुल गर्भगृह के बाहर
एक नौजवान भावों से भरपूर
जोर-जोर से हिला रहा था
अपनी बूढ़ी माँ के हाथों से
मिलाकर अपने हाथ
कितने सपने, अरमान कितने
न जाने संकल्प कितने पूरे हुये होंगे उसके

सोचता हूँ मैं
घर से तिरुपति तक कैसे लाया होगा वह
अपनी माँ को
और यहाँ भीतर गर्भगृह तक
वैसे ही जैसे कभी
माँ लाई थी उसे अपने गर्भगृह में
सँजोये कितने सपने, अरमान कितने

और फिर तिरुपति बालाजी के रचे
इस भौतिक मायावी संसार में
निहारा होगा जब उसने
अपने इस बेटे को पहली बार
और कुछ नहीं देखा होगा
अपने आसपास को

कहाँ देखा उस प्राप्त क्षणाँश में नौजवान ने
एक बार भी बालाजी को
मैं भी माया में रम गया
नहीं पाया निहार बालाजी को
क्या देखना इस प्रस्तर को
जो मुझसे भी अधिक है अचेतन
देखा मैंने
स्वयं श्रीकृष्ण ही आये थे
अपनी क्लांत, वृद्धा यशोदा को लेकर
विष्णुपति के द्वार

साक्षात दर्शन के बाद
लग गये घसिटते पैर प्रसाद की कतार में
कहा किसी ने
आपको लाइन में लगने की क्या जरूरत
अलग खिड़की की है व्यवस्था
व्यवस्था ने समझी है विकलाँगों की विवशता

मिले शुद्ध घी में सराबोर दो लड्डू
रख लिये सम्हाल कर मैंने भिलाई बिरादारी के लिये
याद आई छत्तीसगढ़ी कविता
जगन्नाथ के भात को
जगत पसारे हाथ
यहाँ भी प्रसाद में मिला
दही मिला गर्मागर्म भात
कुछ विदेशी बालायें और पुरूष
असमंज़स में थे कि क्या करें इस प्रसाद का

कहा मैंने
‘जस्ट टेस्ट इट’
उन्होंने फिराई जीभ दोने पर
और फिर मुझसे भी जल्दी
खाली कर दिया दोना

देखी साँध्य आरती पारम्परिक विन्यास में
कुछ चीज़ें हैं जो कभी नहीं बदलतीं
पूर्णिमा, अमावस, सूर्योदय-सूर्यास्त सी
याद आई
मथुरा में कभी देखी
जमुनाजी की साँध्य आरती

बाकी है बहुत कुछ अभी भी
भारतीय संस्कृति के भग्नावशेषों में
कीर्ति की विरुदावलियों के पक्ष में
समय की अदालत में साक्षी के लिये
बचा है अभी भी बहुत कुछ
मसलन तिरुपति के दरबार में पहुँचा
माँ को लेकर श्रवण
टैक्सी वाला हरिभाई

हमारी भारतीयता के ये आधार स्तम्भ
उतने ही मज़बूत, पक्के और समय-जीवी हैं
जैसे दिल्ली में अशोक की मीनार
और छत्तीसगढ़ में पक्की ईंटों से बना
ईश्वर का एक और घर
सिरपुर में अभी तक है जो
अविच्छिन्न खड़ा हुआ

बेटी की बेटी के लिये

बेटी की बेटी के
जन्म दिन पर
सोचा बाटूँ अपना सुख
अपनी कलम से

कलम साथी है
वैसे ही जैसे रहता है साथ
सुख का, दुःख का
आती-जाती श्वाँस का
जुड़ती-बिखरती साँस का

बेटी होती है किरन, भोर की
ज़िन्दगी के छाज़न से
उतरती है सुख सी
गोद में समेटने पर
लगता मानो भर लिया है
माँ को अंक में

छोटी सी दमकती
दीप-शिखा होती है बेटी की बेटी
आँगन में तुलसी के चौरे पर
पूजा घर को बिखेरते उसके नन्हे हाथ
सुगढ़ता से गढ़ने लगते
फिर-फिर मेरा छोटा सा संसार

घोसले के मुँह पर ही मिलती
हमेशा हाथ में लिये पानी का गिलास
छीनने सा पकड़ती है बस्ता-थैला
जानती है, पर मानती नहीं
उसे देखकर ही बुझ जाती है
उसके नाना की प्यास

किरन वही भोर की
बदलती जाती चपला में
हिमालय से भी
लगने लगती ऊँची / वही बेटी
जब होने लगती है ऊँची

नहीं जानते कैसा होगा
उसका घर-संसार
कैसा होगा उसका जीवन
कैसी देख-रेख

कैसी करूँ प्रार्थना अगम से
इतनी कोमल, इतनी लाड़ली है
मेरी बेटी की बेटी
नहीं डालना चाहता / मन से
उस पर आर्शीवाद तक का भार

होने न होने का प्रश्न

हे ईश्वर!
तुम तो थे / तुम हो भी / और रहोगे भी
हम भी थे / हम हैं भी / और रहेंगे भी
किस हिसाब से किसको-किसको
क्या-क्या कुछ-कुछ बटता है
तुम सर्वज्ञ / हम अल्पज्ञ
हे ईश्वर! कुछ तो समझाओ

ज़िन्दगी समतल है / ज़िन्दगी पहाड़ है
ज़िन्दगी सरल है / ज़िन्दगी गरल है
हे सरताज सुरों के / हम बहरे-गूँगों के लिये
भले भरा हो पेट गले तक
कुछ तो गाओ
हे ईश्वर! कुछ तो बहलाओ

क्यों बात-बात पर / बिना बात पर
होती है तक़रार नींद से / रात-रात भर
जब निश्चित है जनम / और मौत भी
क्यों जाते हैं लोग / बिना मौत भी
कुछ न कुछ तो दो सफाई
हे ईश्वर! सूचना अधिकारी का नाम-पता बतलाओ

बात जरा सी / साँस जरा सी
बिना हमारे / तुम आखिर हो क्या जी
अमृत पीकर तुम जी न पाये
जहर मिला / हम मर न पाये
तुम्हारी धरती पर / हम बदस्तूर सवार जी
हे ईश्वर! अब भी तुम हो क्या जी

Thursday, November 3, 2011

भाषा मनुष्य का महानतम अविष्कार

भाषा को साधना
उतना ही कठिन है
जितना पोटली में
प्रकाश को बाँधना

भाषा के तिलिस्म में
क़ैद हो गई है कविता
या कविता खुद ही तिलिस्म है
भाषा की

भाषा मिट्टी है जिसे रौंदकर
गढ़ता है कवि कुछ नया-नया
रचता नहीं कवि
मूल है मिट्टी
किसी ने नहीं बनाई आज तक
घनानन्द ने कहा है
कविता ने रचा है उसे

कविता रचने के अहम् से
कविता द्वारा रचे जाने के
विनय तक की यात्रा है
कवित्व की पहली सीढ़ी
और कविता का आधार
होती है भाषा

मिट्टी से जुड़ना
आकाश तक पहुँचने का मार्ग है
मिट्टी के ही जाये हैं
फूल और पर्वत
चक्कर लगाती है हवा
हो जाते हैं आकाश जो
वे नहीं मिल पाते मिट्टी से कभी
और आँसू बहाते हैं

ईश्वर को ईश्वर बनने के लिए
मिट्टी बनना पड़ा
मिट्टी से मिलना पड़ा
भाषा ने ही रखा है जिन्दा
ईश्वर तक को / मानव को
और तुमको भी सदी

जंगल में पेड़
चाहे हो किसी भी जाति / गुण-धर्म का
झाड़ी हो / या हो फूलों की बेल
बालियाँ हों धान की
या जीवन सी दूब
सबकी जड़ें मिट्टी में होती हैं

अलग-अलग रंगों में
अलग-अलग तासीर में
होती है संस्कृति / धर्म और भाषा
समय का गोल चक्कर है
बीस सदियों में / बीसों बार समझ कर
बरबस बिसरा दी जाती है यह बात
कि कभी विजय नहीं पाई
खून ने पसीने पर / रोशनी ने अँधेरे पर

इस सदी में उजाला
बनिस्बत कुछ ज्यादा बढ़ा
रोशनी होती है पारदर्शी
सब कुछ उघाड़ती/मूँदती/अंर्तनेत्रों को
खतरनाक अँधेरा नहीं
उज़ाला होता है
जब जाग जाता है
ईश्वर तक को बनाने वाला

पानी थमा तो / सड़ा पानी
पथ हुए पग-विहीन तो / खो गए
मिट जाती है वह संस्कृति / सभ्यता और भाषा
जो बदलती नहीं
सीखती नहीं तुमसे समय
सदा चलते रहना

बने रहने के लिए
अनिवार्य है गत्यात्मकता
तुम्हारे ही समय में सदी
कहा है एक महान् चित्रकार ने
ठहर गया धर्म / खो गया ईश्वर
सो गया राज्य / खो गया इंसान
भाषा मिट्टी है / नदी है भाषा
जो रहती है बनती
जो रहती है बहती

ईश्वर के समक्ष
पहली उद्घोषणा है भाषा
मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की
समूची स्रष्टि में
अपने श्रेष्ठ होने की

साक्षात्कार

दुर्गम गिरि शिखर
करते रहे हैं आमंत्रित
मानव-पगों को / सदियों से

स्थिर यायावर / अविचलित हिमाद्रियों पर
हरी शाल लपेटे
ऊँघते जंगल
सुनते हैं लोरियाँ कलरवों से
शीतल मंद समीर के झोंकों से
सिहरते पर्वत
भेजते रहते हैं पातियाँ / नदियों से

अपने मन के पैरों की थिरकन से
विचलित मेरा तन
धरती पर ठहरा
निहारता नीला गगन
गगन छू लेने की चाह में
टटोलता धरती की उठानों को
शुरू हो जाती चिर-वाँछित यात्रा
शोर से शान्ति की
ताकि मिले अधीर मन को
प्रतीक्षित विश्रान्ति

कछारों से / पठारों से
ऊँचे-ऊँचे देवदारों से
ओक से / मन में थमे शोक से
पूछता / कहाँ हैं पहाड़ों के पड़ाव
वादियों में घुसपैठ कर चुकीं
ऊँची-नीची सर्पीली सड़कों से
जोड़ता रिश्ते / करता बातें
अपने इस्पाती सहकर्मियों के पसीनों से सिरज़ी
रेल की पाँतों पर उड़ता
ऊँचाइयों की ओर
छूटता जाता पीछे
प्रगति का भयावह शोर

इन्हीं पहाड़ों ने कभी किया था
आकर्षित आक्रान्ता डलहौजी को
मैं भी थमता इसी ‘डलहौजी’ पर
सरकती जाती चिलमन हिमगिरियों की
और मैं लगता सिहरने
तन से / मन से भी

निहारता अनिर्मिमेष प्रकृति का भव्य सौन्दर्य
महसूसता अंतः तक प्रकृति का औदार्य
निरन्तर / शाश्वत और अप्रतिहार्य
जीवन का यह अनुभव माना अनिवार्य

दिखते पहाड़ों पर बने
छोटे-बड़े मानवीय घोंसले
और बल खाती पगडंडियाँ
जागता कसकता अपराध-बोध
साफ दिखतीं / श्रृंग-शरीरों पर
हमारे द्वारा डाली खरोचें

कुछ घटता ही है विशेष
जब मिलते हैं पुरुष और पहाड़
‘हिमगिरि’ में मिलते सज्जन
बड़े गर्व से बतलाते
सुकवि सोहनलाल द्विवेदी संग
उनने कुछ दिन थे गुजारे
‘डलहौजी’ में अवस्थित ‘टैगोर पार्क’
है खुला इश्तहार
बड़े-बड़े कवियों ने
इन गिरियों को कभी किया था नमस्कार

टूटा-फूटा तन लेकर पहुँचा यह अक्षर-किसान
पूरब-दक्षिण के पहाड़ों से
हुई कभी थी पहचान
झारखण्ड के सम्मेद शिखर की
नापी-तौली थी आध्यात्मिक उठान
सोचा मणि-महेश के श्वेत-शिखर तक जा पहुँचू
माना जाता है जो भारतीय दर्शनों का आधार
जरा जाँचँू, परखूँ
कितना ऊँचा / कितना नीचा है
हिमाचली पहाड़ों का यह परिवार

हम मनुष्य ही पाते हैं कुछ सोच
हम ही सोचते हैं ऊँचाई और निचाई
अंतर के सारे समीकरण
गढ़े हैं हमने ही
गढ़ी हैं जातियाँ ऊँची-नीची
धरा के शिखर तक धमके
धरा के गर्भ में भी जा घुसे

प्रकृति ने दीं हमें शक्तियाँ अपार
सौंप दिया नियन्ता ने
अपना समूचा कारोबार
समय और प्रकृति के द्वन्द्व में
हम हुये थे तैनात रक्षक की तरह
हमने किया व्यवहार अब तक
भक्षक की तरह

पहाड़ों के सामने आते ही
खटकने लगता है अपना बौनापन
नदियों के पास जाते ही
बिखरने लगता है
मनुष्य होने का अपना अहम्
रावी का शीतल जल
और कलकल नाद
जतला देता / कितना फीका है
मानवीय संगीत का नाद और आह्लाद

सरल नहीं होतीं यात्रायें
नदियों की / पहाड़ों की
हमारे अंदर भी होता है वही संसार
जो होता है सामने आँखों के
दिखता है हमें साफ-साफ
हमारे अंतस् में भी
बहती हैं नदियाँ
हमारे अंतस् में घर बनाकर
जमे रहते हैं पहाड़
अंदर भी बहती हैं हवायें
झूमते हैं वृक्ष
खिलते रहते हैं फूल
सुन सको तो
अंदर भी गूँजता है कलकल नाद
फुदकती हैं गिलहरियाँ
नाचती हैं चिड़ियाँ
अंदर की यात्रा होती है और भी कठिन
पहले तो दुष्कर होता है
अंतस् में प्रवेश कर पाना

नदियाँ बहती हैं
नहीं जानतीं / देश/प्रान्त की सीमायें
नहीं मानतीं / वर्ण/वर्ग-भेद की बाधायें
सबके लिये खुला है उनका आँचल
सबके लिये जगह / जैसे गोद जननी की
पर्वत भी विचरने देते / अपने पर / सबको
सबके लिये जगह / जैसे छाती पिता की

कोई दरबारी राग नहीं
कोई समय की बात नहीं
श्रृंगार किया है रंग-बिरंगे फूलों से
अपूर्व गंध लिये / सर्वदा / सबके लिये
हवायें दिखतीं गीत गातीं

रावी के प्रबल वेग से
हो जातीं गोल-मटोल चट्टानें
मानों पर्वत और नदी के प्रणय-प्रसंग से
पैदा होतीं शिवfलंग सी संतानें
पहाड़ तराशे जाते
समय और नदी के प्रयास से
और उतरते नीचे / मानों पतन-गर्त में
शिखर चूर-चूर हो जाते
बालू में बदलते जाते

शायद इन्हीं से सीखा हमने
माँ के दूध को डिब्बों में सजाना
वहीं के वहीं हैं
पर्वत, पेड़ और नदियाँ
सदियों में बदला है
तो सिर्फ हमारा जमाना

इन्हीं बालूओं से हम बनाते
अपने अपनों की सपनों की दुनिया
संस्कृति और सभ्यताओं की अट्टालिकायें गगनचुम्बी
गगन चूमने का गर्व तिरोहित हो जाता
अपने रचने की प्रतिभा का दर्प पिघल जाता
देखकर पिघलते हिमगिरियों को
fनःस्वार्थ बहती नदियों को
निरख कर / समाधिस्थ वृक्षों को
सुन कर गाते पँछियों को
देख कर थिरकती गिलहरियों को

सारा जोड़-घटाना लगने लगता व्यर्थ
बिना पहाड़ के / नदियों के / पँछियों के बिना
क्या है धरती पर जीवन का
और किसी के भी जीने का कोई अर्थ

हुआ परिचय पहाड़ों से
परिचय से ही जनमता और फिर बढ़ता है प्यार
अपरिचय से बना रहता है अज्ञात भय
परिचित होने तक
जानने और मानने पर ही
प्रतिमा बन जाती है पूज्य
कितने-कितने रूपों में विराजित हैं
देवियाँ पहाड़ों पर
शक्तिस्वरूपायें ठहरी हैं
अपने-अपने ठिकानों पर

माँ तक जाना
इतना हुआ कठिन कब से
सम्भवतः तब से
बड़े, और बड़े होने लगते हैं
हम जब से

चम्बा की देवी से मैंने इतना ही माँगा
मुझे आस्था नहीं / ज्ञान दो
मुझे मुक्ति नहीं / संघर्ष की शक्ति दो
मुझे आशीष नहीं / अपने होने की स्वीकृति दो

यदि दे सकती हो
और चाहती हो सचमुच कुछ देना
मुझे दो पंचतत्वों की वही मूल शक्ति
जो पहाड़ों ने पाई है
जो नदियों में समाई है
जो ज्वालामुखियों में छिपाई है
जो हवाओं में बहाई है
दो वही मूल शक्ति
जो नभ की तरूणाई है

नहीं है कामना अमरता की
जानता हूँ कहानी त्रिशंकु की
मैं नहीं चाहता ठहरना वैसे ही
जैसे पहाड़ पर ज्यादह नहीं ठहरता प्रकाश
पसरता है अंधकार
सब कुछ काला करता हुआ
आगत लालिमा के लिये
उपयुक्त पृष्ठभूमि बनाता
कितना भयावह होता है अँधकार
दिखने लगता है सब कुछ साफ-साफ
प्रकाश की ही नहीं
अँधकार की भी होती है एक भूमिका
बिल्कुल ऐसा ही होता है जीवन का चक्र

समझ में आने लगता है
कितना जटिल है जीवन का जंजाल
जब फटी स्वेटर पहन कर
हिमगिरियों में मिल जाता है
देश का एक कोई नौनिहाल
बेचता मुझे तरह-तरह की शाॅल
नीचे की दुनिया नहीं सिखा पाती दुनियादारी
पहाड़ पर कब पनपा व्यापार
पहाड़ पर कब रुका अर्थ का रथ

अविचलित स्थिर पहाड़
जब भसकते हैं / भीतर की तड़फन से
सब कुछ हो जाता है पहाड़ ही पहाड़
कभी नहीं दहाड़ता पहाड़
पहले कभी नहीं करता है वार
हम उसे जानें या न जानें
वह हमें जानता है

सबसे ऊँचा और
ईश्वर के सबसे निकट होता है पहाड़
इसीलिये अपने कई रूपों में
जमा है ईश्वर वहाँ
जिसको भी जाना होता है
किसी अनाम/अज्ञात सत्ता के पास
उसे अंततः चढ़ना ही पड़ता है पहाड़

Wednesday, November 2, 2011

प्रकृति विलगा

थोड़े बड़े मकान की लोभ मैं
अपना थोड़ा छोटा सरकारी क्वार्टर
बदल लिया मैंने
छूट जाता है बहुत सा अतीत
वर्तमान की दौड़ में भविष्य के दॉंव में
भविष्य की चाह में
ऑंगन में फलता अनार रह गया पीछे
कीड़े खा जाते थे फल
हम तोड़ नहीं पाते थे
कुछ लगाव सा था उस अनार के पेड़ से
छूट गये काफी लम्बे और लगभग घर की पहचान बन चुके
ऊंचे पूरे युक्तिगत और सदाबहार ‘अशोक’
अशोक छूट गया पीछे
बहुत लिपटीं बेंतें गुलाब की
बोगन बेलिया और चमेली
मधुकामिनी और रातरानी
कुछ ज्यादा ही खिलने से लगे थे
रोकना चाहते थे सब
विदा किया सबने
मौन शुभकामनाओं की गंध दान कर
नये घर में भी बड़े-बूढ़े से आम
नीम और जामुन मिले
चला था बुद्ध बनने
बन कर सिद्धा थे लौट गया वापिस
कविता के पास
सुनहरे भविष्य को ठीक से पालने
कोई पेड़ काटे
मुझे लगता है
यह सटीक
प्रमाण है मेरी हत्या का
मेरे परिवार
समाज
और देश की हत्या
लगता जैसे पृथ्वी को कुतरने लगा है कोई
काटने लगा है जीवन की जड़
पेड़ काट कर
कुछ काटने भी पड़ते हैं
जिनका काटा जाना एक जरूरी
संघर्ष की तरह
लाजिमी है शायद
गलती से कर्मइहॉं
ने काट दिया एक अचीन्हा
न फल
न फूल मेरे लिये
अपरिचित पेड़
एक उड़िया सयाना
ठीक उसी तरह
नमूद हुआ मेरे सामने
जैसे कि शोक में बैठने
आया मेरे घर
यह बताने कि एक बूढ़े पेड़ की
तरह वह है अभी भी
मैं छोटा न करूं दिल
कहा उसने
बाबू औषधि का पेड़ था यह
हवा को शुद्ध करने वाला
सबसे कारगर सयाना
इसका औषधिक उपयोग
जानने वाला जाने
औषधियों का परिवार में
बड़ा मान है इस पेड़ का
मेरा दुःख दुगना हो गया
काटा जा रहा है वो
जिसका अतिशय जरूरी है रहना
बने रहना
चार-पॉंच सदियों जैसा तना बाकी था
सयाने उड़िया के साथ
मैने उसे अपनी चिन्ताओं व
प्राथमिकताओं की निगरानी में ले लिया
बड़ी जतन हुई
उसका किया गया ईलाज
आश्चर्य तने से फूटे पॉंच बाहू
आपस में एक दूसरे की तरफ मानों जैसे मूँह किये हों
अशोक चक्र के शेर आग में अशोक की
अपनी एक प्रिया मित्र के कहा मैने
जानती हो
एक तोता लाया हूँ मैं
बिल्कुल सीधा बैठा रहता है
उन पॉंच बाहुओं के बीच
हमारी कल्पना में जैसा बैठा हो
कुछ हमारी चाहत का संसार
हमारी सोची दुनिया
दुनिया जैसी दुनिया उसने कहा
एक बात कहूँ
बुरा तो नहीं मानोगे
उसे बांध कर मत रखना
मुझे सचमुच बुरा लगा
कहा मैंने हम बंधनों के खिलाफ ही खड़े हैं
हम पंछी को क्या बॉंधेगे
वह कला है
किसी फुटपाथ पर मेहनत से
ढालता है तोता
मिट्टी से लगता है रंग प्रकृति से चुन चुन कर
ऊपर वाले के तोते से
ज्यादा जीता है नीचे वाले का तोता
पर सुरक्षित बने रहने की बड़ी कठिन शर्तें हैं
पंछी हो पर
पर नहीं फड़फड़ाना
जब हम देखें
एक सी मुद्रा में अटेन्शन नजर आओ पंछी हो
पर मुंडी नहीं हिला सकते
ऑंखें नहीं मटका सकते
अपने प्रेम का ककहरा
नहीं गुनगुना सकते
इतना रोया आसमान
धुल गया तोता
पॉंच बाहुओं के बीच संरक्षित
किले में सजा हुआ
fसंहासन पर राजसी मुद्रा में बैठा हुआ
बदरंग हो गई उसकी पहचान
गरीबों की कलाओं पर
गरीबों की मल्कियतों पर
अक्सर बरस जाता है जब देखो तब आसमान
मैं ओलों की मृत देह
जब बरस रही थी
जाकर उठा लाया तोते को
ले लिया कलम की सुरक्षा में तलाश है
फुर्सत की
उस कलाकर की
जिना कच्चा पर
पक्का ठिकाना मालूम है मुझे
हमेशा किसी फुटपाथ पर
जहॉं खूब फिरती है जनता
रकम-रकम की जैसे ही मिलेंगे
कलम और रंग तैरेंगे श्रम के सरोवर में
गोद भर जायेगी फिर
उन पॉंच बाहुओं वाले शिशु सयाने पेड़ की ।

लूले पत्थर

जिन्दगी भर
जिन्दगी के पैरों तले ही
रहता है पत्थर

जिन्दगी पत्थर में
भरती रहती है
भरपूर जिन्दगी
जिन्दगी भर

पत्थर पड़ जाने के बाद
नहीं रह जाती जिन्दगी, जिन्दगी
कहते हैं पत्थर के नीचे
कुलबुलाती रहती है
ताजिन्दगी जिन्दगी

सुना है,
बावक्त कयामत
उठेगी जिन्दगी
रूबरु होनेे उसके
जो कभी रूबरु नहीं हुआ
किसी के

सोचता हूँ मैं
कयामत के वक्त
कहाँ होगा पत्थर
जिन्दगी के नीचेे या
जिन्दगी के ऊपर

पत्थरों को तराशने वालों ने
नहीं सोचा कभी
पत्थरों के बारे में
पत्थरों की पनाह में
जागती-सोती
जिन्दगियों के बारे में

पत्थरों को जिन्दगी के साथ
कायनात बख्शने वाले ने भी
कहाँ सोचा
कहाँ होंगे पत्थर
कयामत के वक्त
ता-कयामत जिन्होंने
उठाई है जिम्मेदारी
जिन्दगी और मुर्दानगी में
फर्क जताने की
जिन्दगी को जिलाने की
मौत को दबाने की

कयामत के दिन पूछेगा पत्थर
पकड़ कर दामन, खुदा से
बता कयामत के बाद
मेरी जगह है कहाँ?
अगर हाथ होते तो पत्थर
तार-तार कर देता गरेबाँ
कयामत के दिन
जिन्दगी, मौत और खुद को
बनाने वाले का
स्वयं को कहीं रूपोश रख
दुनिया को चलाने वाले का

Tuesday, November 1, 2011

मित्र

मित्र
होता है एक अहसास
ऐसी सुरक्षा जो पुरसकून है
और आरामदेह भी

मित्र
होता है एक निर्बन्ध सम्वाद
नहीं करनी पड़ती शब्दों की बुनावट
बातों की स्वाभाविक बरसात

मित्र
होता है आईना
जिसके सामने कभी नहीं शर्माता कोई
और न ही बनानी पड़ती हैं
सोच / समझ की मुद्रायें
होता है नि:संकोच सजना-सँवरना

मित्र
होता है कड़ी धूप में ठंडी छाँव
अपरिचय के सागर में डूबते की सोच में
परिचय का गाँव

मित्र
होता है अज्ञात के कौतुक समन्दर में
साथ-साथ डूबने-उतराने वाला
अपने ही अनुभवों और ज्ञान की बैक-फाईल

मित्र
होता है मरण भी
कर देता अलग सबसे
वैसे जीने के लिये
बहुत कुछ सिखा सकता है मरना

मित्र
अफसोस! मरने के बाद
कहाँ हो पाता है जीना
मित्र के छूट जाने पर
मित्र के रूठ जाने पर
सिकुड़ जाता है
बड़े-बड़े हौसलों का सीना

दूध का कर्ज

अपनी जान से बढ़कर चाहते हैं
जिन्हें हम
हमारी औलादें
अपनी शिक्षा में बड़ी नफ़ासत के साथ
हम लादते जाते हैं
उन पर फर्ज-दर-फर्ज

अपने ही अंशों तक से व्यापार
मुहावरे गढ़ डाले
खोल डाला दूध तक का खाता
मांढ़ दिया औलादों पर
दूध का कर्ज

परवान चढ़ाते हैं
मजबूत करते हैं उनके पर
दिखाते हैं आसमान
दिखाते हैं सितारे
कहते हैं, दमको चाँद-तारों की तरह
पर बाँधकर रखना चाहते हैं
उनके पैरों को
अपने घोंसलों के तिनकों से

बांधकर नैतिकताओं और परम्पराओं -
के ढकोसलों से सजी अदृश्य जंजीरों से
मांगने लगते हैं ब्याज समेत
अपनी एक-एक थपकी का खर्च

वैसे अपनी बची-खुची जिन्दगी
रेहन रख दी होती है हमने
आशाओं की अदायगी में
अपने सपनों की तिज़ारत में
नीलाम कर देते है हम
ममता के विरल/तरल अहसास को

मौत की यकीनी
तल्ख़ करने लगती है
fजंदगी के जाम की
चंद बचीं घूँटें
व्यर्थ लगने लगता है
सारा हिसाब-किताब

दरअसल व्यर्थ है हमारी आशायें
लादल हैं हमारे सपने
प्रायोजित है हमारी शिक्षा
षड़यंत्र है जीवन की ऐसी व्यवस्था

दुनिया धड़ाके से नहीं बदलती
गाते रहो / लिखते रहो
बकते रहो । सिकते रहो
हाँक पाड़ते-पाड़ते
मेरी तो गूँगी पड़ने लगी है जुबान
दुनिया फिर भी नहीं सम्हलती
फिर भी जारी रखूँगा
भंगिमाओं से ही देता रहूँगा बयान

एक दिन आयेगा
जब सूरज के उगने पर
बगावत करके
सिकुड़ने के लिये
कमल खिलने से
कर देंगे इंकार

उस दिन की नज़र उतारने
वैसे मेरे पास तो नहीं है कोई खाता
यदि कुछ दर्ज हो कहीं
किसी और के खाते में
तो आज मैं
अपने बच्चों के सारे कर्ज
मुआफ करता हूँ
गुजरे जमानों की गर्द झाड़ कर
लेन-देन का गंधाता
सदियों पुराना
रिश्तों वाला बस्ता साफ करता हूँ

हवा महलों के आधार

रात आधी
नींद आधी
जागती थी चेतना
चेतना का मन
आधा भरा
छलका आधा

चेतना की तंद्रा को
झटका सा लगा था
बिजली का
बिजली की अचानक
गैरमौजूदगी से
आधी खुली खिड़कियों से
आती थी
आधी तेज
आधी धीमी
आधी हवा

कुछ बरसा पानी
आधा भारी
आधा धीमा
बिजलियों के नन्हें बच्चे भी
चक्कर काट रहे थे
बादलों की
अंगुलियाँ पकड़
आसमान के पार्क में

आधा लेटा
याने अध-लेटा
आधा उठा
बैठा आधा
दिखा पैड आधा
और बिना कैप की
पेन आधी

पाँच हजार वर्षों की
सभ्यता का
मुझे धुँधला सा
पता है
वह भी
सुनी-सुनाई
सूचनाओं के बतौर
वह भी
मात्र आधी अवधि का

बहुत सी
स्टाम्प-पेपरों पर
टँक कर जैसे
चीजें बन जाती हैं सत्य
और
कानूनन सत्य भी
हमारे बहुत से ज्ञात
ऐतिहासिक सत्य
ऐसे ही
स्टाम्प-पेपरों पर दर्ज
सत्ताओं के फ़रमान हैं
आस्थाओं के
हवामहलों पर लहराते
आसमानों के
निशान हैं

अलबत्ता अधकचरा है
अब तक बटोरा सहेजा ज्ञान
यूँ तो कचरे से
बिजली बनाने की बात
लिखी-पढ़ी जा रही है

वैसे कचरा भी
सही ढंग का हो
तो कुछ न कुछ
काम आता है

मनुष्य रूपी कचरे पर
मक्खियाँ नहीं भिनभिनातीं
मच्छर भुनभुनाते हैं
मच्छरों को मारना
या हमारी क्रियाओं से
उनका दुर्घटनावश मर जाना
fहंसा है

हमारा पक्ष होता है कि
हम मच्छरों को मारने
उनके पास नहीं जाते
अलबत्ता वो ही पास आते हैं
इसीलिये बेचारे
मारे जाते हैं
यह देह देश को बचाने जैसा
पुनीत कार्य है

यह fहंसा को सत्य और
कर्म-जन्य सत्य
करार देने का
पारम्परिक और विधिक आधार है

तभी बात कौंधी
बिजली जाती है तो
अँधेरों के जीवधारी अंश
लपकते हैं
मनुष्य-देह की ओर
आखिर हम
ईश्वर तक के साँचे हैं
अँधेरों के जीवधारी अंशों का
आसुरी संहार fहंसा नहीं
धर्म युद्ध है

यह हिंसा को सत्य और
मूल्यगत सत्य
करार देने का
धार्मिक आधार है

चौका मैं
मुझे कुछ ज्यादा ही
काटते हैं मच्छर
मेरी देह से फूटता है
क्या कोई
प्रकाश ज्यादा
जिसके अंधःगर्त के
अंदर का अंधकार
करता है आकर्षित
अपने जीन-सम्बन्धियों को
परम्परा से,
विष पीते-उगलते
जीवित अँधेरों को

आवाज उठाते ही
घोंट दिये जाते हैं गले
सारी दुनिया जो
अकेले ही हड़पनी है हमें
किसी को नहीं
कोई बँटवारा

हिंसा को सत्य
और आवश्यक सत्य
बताने का यह
दार्शनिक आधार है

हिंसा इसीलिये बची है
क्योंकि
जितनी बड़ी होती है fहंसा
उससे बड़े ढाल होते हैं
पास हिंसा के
धार्मिक, पारम्परिक, विधिक
और दार्शनिक आधारों के

अँधेरों को
प्रकाश की मार से
बचने के लिये
प्रकाश की ही
ओट मिलती है

प्रकाश की ही
ओट मिलती है
अँधेरों को
छिपने के लिये

आधा अँधेरा
आधा उजाला
आधे दिखते
आधे छिपते
आधे-आधे
अँधेरों-उजालों के
आधे-अधूरे
दलालों को
झाड़ कर सारे
गर्द-जाले
पूरे उजाले में
सारी दुनिया के
सामने लाना है

फिर से
सारी दुनिया के लिये
सूरज को एक सा
सबका, और सबके लिये
बनाना है
हवामहलों की धुँध
तिरोहित करने
एक पूरा का पूरा
नया से नया
सूरज उगाना है

Monday, October 31, 2011

जीवन में रंग

इतना रक्त बहा
मिट्टी का रंग लाल है

हमारे घर / सफेदी का लिबास ओढ़े
छिपाते हैं रंग
होते रहते हैं बदरंग
फेंकती रहती है पानी के छींटे
खेलती मानव से प्रकृति

वैसे तो सारे रंग मिलते हैं
खोज लिया आखिर शिशु ने
माँ की छाती में कहीं न कहीं
मिट्टी सफेद
और जाना / लाल रंग
होता है / अंदर ही अच्छा
हरा / भर जाता है हर घाव
आसमान नीला / नीली झीलें
पीला बसंत
मटमैली कर देती है वर्षा
और हवा भी रंग जाती है
कभी कभी

काले बादल
जब छुपाते चाँद
एक प्यार की अंगुली
बादलों को समझाती-सुलझाती
दिखलाती है जरा सी झलक
नीलम नयन की
लाल लाल रंगों के बीच
खिल उठते मोती सफेद
इसी क्षण ने
दोहराया होगा आदमी को
बिखरा लो / फैला दो इस रंग को
अपने नीड़ के अन्दर बाहर

सही रंगों का सही ज़गह होना
ज़रूरत है जीवन की
सही रंगों को सही ज़गह रखना
इबादत है जीवन की

हर कालजयी संस्कृति और सभ्यता के
नीचे बहती है एक काली नदी
खून की
एक न एक दिन
होयेगी सारी मिट्टी सफेद
जब भविष्य धो सकेगा
बहा सारा लहू इतिहास का

तब कोई नहीं छिपायेगा मुँह
न ही लटकायेगा मुखौटे
अन्दर-बाहर / घर-दुकान
रंगने के काम से भी
मुक्त हो जायेगा आदमी

तब भी क्या नहीं लगेंगे रंग ज़रूरी
न ही होगी चाह मन में
सिहरन का स्वाद दोहराने की
क्या अप्रासंगिक हो जायेगा प्यार
क्या अनावश्यक हो जायेगा अपनापन
रंगों का बाँध बना
क्या रंगों को बाँध लेगा आदमी
क्या रंगों को बाँट लेगा आदमी?

नहीं! इतनी सामर्थ्‍य मत देना कभी
माँ की छाती पर घूमता शिशु
रहे खेलता / हँसता / रोता
जागता / सोता / सपनों में विचरता
यही तो है जीवन की आत्मा
जीवन का अमरत्व
और निरन्तर अमृत-मंथन

सभ्यता के कलेवर
बदले हैं / सदियों में समय ने
आत्मा तक को पहुँची है ठेस
रंग मरहम हैं
जीवन है तब तक
जब तक हैं
जीवन में रंग

अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

एक और प्रकाशोत्सव

वैसे तो दीपावली की शाम
कुछ ज्यादा ही कर जाती है उदास
खुशी से अधिक प्रकाशित होती है कसक
जो होते हैं पास अपने
उनसे ज्यादा खलती है कमी उनकी
जो नहीं होते पास

एक अतिरिक्त प्रकाश
दौड़ाता है अतृप्त मन को
उन अँधेरों में
जहाँ छिपी हैं स्मृतियाँ
हाँफता है, काँपता है मन
कुछ ज्यादा ही दीपावली की रात

घूमता मैं थिरकते, किलकते बाजार में
ग़ालिब की तरह गैरख़रीदार
मुफ़लिसी की मस्ती नहीं
न ही दीवाने-ज़ुनून
नहीं पूछता फुलझड़ियों के भाव
मेरे लिये सूना-सूना सा है
विश्व हो या गाँव

दीपों से झिलमिलाती शाम
यौवनित रात्रि हो जाती है
कम्प्यूटर पर लिखता मैं / वह सब
जो जो इतिहास बनता
महसूसने का
वर्तमान के त्रिशंकु सा
मैं भवितव्य को तरसता
तरसता सपनों के सच होने को
खुशियों की हद होने को

जिसके लिये खरीदता था
कुछ गिन-गिन कर
कुछ छाँट-छाँट कर
कुछ रोशनी, कुछ धमाके
उसके हाथ अब खेलने लगे हैं नश्तर से
दर्द के बिस्तर से लगा
बैठा रहता है अब वह
पोंछने अनजान आँखों के आँसू
और भर आती हैं
उसकी माँ की आँखें
यहाँ राह तकते
इस झिलमिलाती नदी में दिखते
मेरी दीपावली के
तैरते उदास दीप

मेरा हृदय घिर जाता धमाकों में
बहुत बहुत थका सा लौटता
अकेला घिरता जाता मैं
असंख्य दीपों के बीच
अपने दिये को खोजती मेरी आँखें
अटक जातीं एक चादर ओढ़े
मेरी तरह अशान्ति को ओढ़े
मन को दबोचे
एक बचपन पर

योगी सा बैठा एक बचपन
देखता आकाश को विदग्ध करते
असंख्य क्षणिक तारे
दीपों से झिलमिलाते
न जाने किसकी धरती के नज़ारे
घुटनों पर ठुट्ठी टिकाये
समाधिस्थ मन
और मैं बदल जाता आकाश में
दिखने लगते मुझे ऐसे ही समाधिस्थ
नितान्त मेरे टिमटिमाते दीप असंख्य

कम थी पहले मेरे पास
फटाके जुटाने की सामथ्यZ
और अब विभ्रमित है मन
योगियों को बाँटू मुस्कानें
या फिर जुगत जुटाऊँ
दीपधर्म की राह सिखाऊँ
अपने मन को सीखूँ ढकना
बादलों को दूँ विदा

पर कम हैं नश्तर
पकड़ा दूँ जिन्हें ऐसे ही हाथों में
कम हैं आँसू
भर दूँ जिन्हें ऐसी ही आँखों में
संकल्पित जिजीविषा को पालूँ-पोसूँ
समय की धोने कालिख
हाथों से दीपक छोड़ूँ

दीप से अब भी
जल जाते हैं दीप
खंगालने होते हैं
चंद मोतियों को चुनने से पहले
पहाड़ भर सीप

सीखने को वसुन्धरा है
निभाने को परम्परा है
एक और प्रकाशोत्सव

Friday, October 28, 2011

सूरज बनाम रोटी

कितना मिलता है सूरज
रोटी से हमारी

सूरज को देखकर
महसूस कर उसकी आँच
शक्ति उसकी
उसकी स्थिर चाल
मनुष्य ने खाना चाहा उसे
शक्ति को सीधे हजम करने की
कोशिशें कीं
पकाये खूब पुलाव ख्याली

तलाशे फल गोल गोल
खाये लाल लाल
फल सूरज जैसे
किये शिकार
कुछ सफेद लाल गोश्त
कुछ गर्म लाल रुधिर
नहीं बनी कुछ बात
भरा नहीं मन

नियमितता सीखी सूरज से
सूरज से सीखा सबको अपनाना
सदियों में जाना
श्रम का अफ़साना
जोड़ा नाता मिट्टी से
जोड़े जल के हाथ
कुछ किया पवन का साथ
सीखा बोना सूरज को

रोज टहलने आता सूरज
चिढ़ाता, तपता तमतमा कर
छिपता बादलों में
जल से करता बातें कुछ
रोकता उसे भरमा कर
फिर छिपता, लम्बा सुस्ताता
चाँद की चिक से झाँकता
कौतूहल जब जागता

मनुष्य नियमित नहीं
सूरज की तरह सुस्ताने में
जुटा रहता बेरा-कुबेरा
जुगनुओं की गवाही में
सूर्योंे की फसलें सँवारता
सूरज की आहट से पहले ही
उठ जाता / तलाशने अपने सूरज
तराशने अपने सूरज

इसीलिये
कितना मिलता है सूरज
रोटी से हमारी

Thursday, October 27, 2011

आबू की बेटियाँ

दयार्द्र लगीं मुझे बहुत ही
आबू पर्वत की ऋंखलायें
हरी-भरीं
स्थिर पहाड़ों पर दौड़तीं
जल-धारायें

ढॅक लेते उतरते / उतराते बादल
और बादलों पर पैर रखता मैं
तत्काल जान जाता कि
कितने खोखले होते हैं
ऊपर बहने वाले
गरजने और बरसने वाले
जीवन देने का दावा करते
श्वेत-कपसीले बादल

फक्क सफेद-सफेद धुँध से
नहीं ढॅकते सिर्फ आबू पर्वत के शीर्ष
ढॅकी रहती है
प्रकृति-रूपा सभी और सब कुछ

अमूमन धरती पर
कुछ भी नहीं होता सफेद
श्वेत दैवीयता के लक्षणों में चिन्हित है
श्वेत पंकज, श्वेत हंस और शुचिता

मुझे दिख जाती हैं
आबू पर्वत की बेटियों की हथेलियाँ
श्रम के स्वेद से धुलती हथेलियाँ
और मैं तय नहीं कर पाता
कि धुँध ज्यादा सफेद है
आश्रम-कुमारियों के वस्त्र / कुछ अजन्मे स्वप्न
या फिर आबू पर्वत की बेटियों की हथेलियाँ

हाँ! मैं तयशुदा जानता हूँ कि
कौन सी सफेदी
सबसे अधिक है
निश्छल और पवित्र

Wednesday, October 26, 2011

लापता ईश्वर के नाम एक और सम्मन

हमारे हर सुखों की आँख में
हमेशा के लिये
मेहमान कर दिये अक्षर आँसू
हमारे हर दुःखों की घड़ियों में
हटा दिया कंधे पर से
एक सहारा

समझाया जाता है
बहुत कुछ घट जाता है
असाता कर्मों के उदय से
जिनके अस्त होने की
नहीं होती कोई घटनात्मक सूचना
बस उदय होते हैं
ऋण के लेखे-जोखे

जनम तो होते हैं सबके
अलग-अलग
किस हिसाब से मौत हो जाती है
बहुतों की एकसाथ
गड़बड़ है सारा लेखा-जोखा
साफ नहीं है कर्मों का हिसाब
सिर्फ ऋण ही दिखते हैं
आत्मा की चमड़ी तक
उतार लेने वाले
ओ, बेईमान सूदखोर
कहते हैं तुझको पाना
नितांत व्यक्तिगत है
जिसे बाँट न सकें हम
वह पाना भी क्या पाना है
मानवता बाँटने पर टिकी है
और तू! अलगाने पर टिका है

अगर एक है तू
और सब कुछ तेरा ही किया-धरा है
भूख-प्यास, मरण-जनम,
दुःख-सुख, माया-काया
तो बड़ा क्रूर खिलाड़ी है तू
हमारे आँसूओं के सागर पर
मुस्कानों की अपनी नाम-नाव चलाने वाले
तुझको भी कुछ जानना शेष है

बू आने लगती है आदमी को
किसी भी पुरानी होती व्यवस्था से
तेरी व्यवस्था सड़ गई है
रंग उतरने लगे हैं तेरे षड़यंत्रों के
कलई उतर गई है तेरे ईश्वरत्व की

विद्रोही होता है पहले कवि
लगाता रहता है नश्तर
व्यवस्था के संभावी नासूरों पर
तेरी मायावी दुनिया को ठोकरों पर रखता है कवि
तेरे जालों पर रखे दानों पर थूकता है कवि
तेरे वरदानों की बारिश को नकारता है कवि
गलती तो सबसे होती है
तूने ही बनाया पपीहा
और तूने ही नक्षत्र स्वाति
आशा और इंतजार
यहीं चूक गया तू

मैं भी जानता हूँ भवितव्य
वह घड़ी जरूर आयेगी
तू भी मरेगा एक दिन
आशंकित हूँ मैं
अच्छा हो तू बना ही रहे
पुनर्जन्म में और भी बिगड़ेगी बात
तेरे कर्म कुछ खास अच्छे नहीं रहे

साहित्य का वंशज है अध्यात्म
समझो साहित्य का पुनर्जन्म ही
तेरे सोने की लंकाओं में
कैद होकर रह गई हैं
अध्यात्म की सीतात्मायें

हमारे हर युद्ध तूने ही लड़े
ऐसा बना रखा है तूने
धर्म के इतिहास को
अगर तू एक है
कब तक, और कितने बनाते रहेगा राम
बासन्देश तूने खुद कहा है
रावण भी तेरा ही खेल है

अजीब गोरखधंधा है
हमारे ही वेश में आकर
हमारे रुधिर से बनाता अपना पुष्पक विमान
अपनी जनता, अपना सिंहासन
और अग्नि-परीक्षित सीता
निरन्तर निर्वासन ही निर्वासन
तारतम्य टूटने से ही जनमती है
एक नई दुनिया

कवि होता है अराजक
खड़ा करता है हर व्यवस्था को
कटघरे में
बढ़ रही हैं तेरी मनमानियाँ
मैं अक्षर-किसान
नहीं डरता किसी से
अपने-आप से भी
तुझसे तो कभी नहीं डरा मैं

अन्याय के खिलाफ़
लड़ सकता हूँ किसी से भी
मैं हारता हूँ या जीतता हूँ
पर बना हूँ
मैदान-ए-ज़ंग में

और तू है
समय से पहले समय का लापता
अश्वत्थामा सा कायर
छुपकर पीठ पर वार करने आदतन आदी
समस्त विशेषणों का भक्षक
मेरी ही अजर-अमर भस्मासूरी रचना
अगर वस्तुतः नियामक बन बैठा है तो
प्रथम-दृष्टया दोषी है तू
इस बार वायदा-माफ गवाह
नहीं बन पावेगा तू

मैं तेरे नाम जारी करता हूँ सम्मन
पेश हो! अदीबों के रूबरु
अक्षर की अदालत में
 बाअदब, बामुलाहज़ा हाज़िर हो!


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

Monday, October 24, 2011

अंतहीन महासमर

कहती है कोई लोक-कथा
बहुत-बहुत समय पहले
समय से पहले
धरती के बहुत पास था आसमान
धरती पर घिसटता था आदमी
छाया रहता था घटाटोप
जिसे अब कहते हैं अँधेरा

कुछ पखेरूओं ने परखा, देखा-भाला
समझा आसमान के खोखलेपन को
बीने कुछ तिनके
और ढकेला आसमान को
ऊपर, और ऊपर
पहल हुई, पहली बार
सिर उठाने की
हाथों को धरती पर टेक
उठ खड़ा हुआ आदमी
चलने लगा, लगा दौड़ने भी

दर्शन हुये सूरज के
दिखने लगा दूर-दूर तक
शुरू हुआ चक्र
शक्तियों की अभिवृद्धि का
इfन्द्रयों की
सुरक्षा, जीवन की रक्षा ने
सिखाया अनुभवों को सहेजना
समूहों मे रहना

बाँटना सीखा मनुष्य ने
बनाये रखने समूहगत प्रतिबद्धता को
गढ़ उसने
अभिव्यक्ति और संवाद की अभिक्रियायें
संकेत बनाये, बुनी भाषायें
रचे स्तुति-गान, ग्रन्थ और मान्यतायें
सूरज की अमरता और निरन्तरता ने
सशरीर अवतरित किया धरा पर
गोपन ईश्वर के निर्वासित वंशज को

अग्नि पर अधिकार से
अपनी मुट्ठियों में रख लिया सूरज
समूची प्रकृति से अलग हटकर
खड़ा हो गया आदमी
अगोपन नियन्ता बनकर

एक-दूसरे की वेदना से
जन्मी हर एक में
संवेदना, कृतज्ञता और अपनापन
जनमने लगे मानवीय गुण
आकार लेने लगीं व्यवस्थायें

घोसलों ने सिखाया घर बनाना
प्रकृति ने दी रंगों की तमीज
दी कलाओं की विविधतायें
कायम रखते हुये वैयक्तिता
साधी सामाजिकता सामूहिकता की
परिभाषित किये सम्बन्ध
और किया सम्बन्धों का विस्तार

अंगों को ढककर मनुष्य ने की
सर्वशक्तिमान से पहली बगावत
किया पहला हस्तक्षेप
प्रकृति की व्यवस्था में
बनाई अपनी एक अलग ही दुनिया
शुरू हुआ एक अंतहीन महासमर
आदि से, व्याधि से, अदृश्य समाधि से

लापता हो गया सर्वशक्तिमान
अश्वस्थामा सा
मृत्यु तक को तरसता
अमरता से अभिशापित
मानव जय-यात्रा हेतु अनिवार्य पाथेय
सम्भवतः बिजूके सा
आवश्यक सर्वशक्तिमान
सुनिश्चित मानव की ही परिकल्पना
और इधर असंहारित परीक्षित
लेते रहे जन्म अनवरत
निर्बल भी बचने लगे
सुरक्षित, संरक्षित और विकासमान
सामूहिकता के कवच में
अपने बनाये बसेरे में

सुख की निश्चिन्त नींद सोने लगा
सदियों पहले धरा पर घिसटता आदमी
दुःस्वप्न सा अँधेरा रोज आता घेरने
एक अविजित चुनौती के रूप में आज भी
टूट पड़ता अशरीरी आसमान
निगलता सूर्य को

फिर बटोरने लगते पखेरू
अनुभवों के, ज्ञान के, विज्ञान के
प्रज्ञा के तिनके
रहते उठाते ऊपर आसमान को
सिर ऊपर उठा ही रहे सर्वदा
सूरज रहे चमकता, करता आलोकित
समय-पथ को

मनुष्य के अंतस् में
घटता रहता यही सब कुछ
अँधेरे की शाश्वता के खिलाफ
अंदर-बाहर अंतहीन है यह महासमर
जाने-अनजाने, देखे-अनदेखे
अपरिचित-सुपरिचित रिपुओं से
मनुष्य के अंतस् में हैं
प्रकृति, मित्र, शत्रु सभी कुछ
और बाहर भी, दिन-रात जैसे

एक बड़े प्याले में
भरी है हवा
उसी में से
हम सभी निगलते रहते हैं
और उगलते भी
वही एक ही, प्राणदायिनी हवा
इस तरह हम सब की
जूठी है,
और स्वीकार्य है
हम सभी को, यह जूठी
वही एक ही, विश्व-व्यापनी हवा

चाहे हों किसी भी देश-विदेश के
किसी भी रंग और रूप के
किसी भी गैबी ताकत के सामने झुके
किसी भी बोली-भाषा में गाते, बुदबुदाते
एक ही धरती पर
टिके हैं हम सभी
साझा है इस तरह हमारा स्पर्श
टिके हुये रहते हैं हम सभी के पैर
एक ही धरती पर
और स्वीकार्य है सभी को
यह साझा आधार

एक ही आकाशगंगा है हमारी
समायें हैं जिसमें हम सभी
जैसे समाये रहते थे
बचपन में
किसी पोखर किसी नदी-नाले
या तालाब में
एक-दूसरे पर जल उछालते
हँसते-खेलते-मुस्कुराते
इस तरह साझी है मुस्कान
हम सभी की

एक ही तो है
आसमान हमारा
सभी के हैं
सूरज-चाँद-तारे
मौसमी अवगुंठनों से
झाँकते नज़ारे
बारिश बटती है सभी को
बराबर-बराबर
सभी को मिलती है धूप और चाँदनी
बिना किसी भेद-भाव के

सभी के लिये है
हमारा अर्जित ज्ञान / अनुभव
हमारी पुस्तकें
यहाँ तक कि सभ्यता और संस्कृति तक
इतिहास में दर्ज नहीं है
कोई भी युद्ध अब तलक
इस बटवारे के विवाद में

लगभग एक से होते हैं
मानवीय सम्बन्ध-सूत्र
एक सी ममता
एक सा पितृत्व
एक सा बन्धुत्व
एक सा प्यार
एक सा दुलार
एक सा निहार

सभी के पास है
अपनी-अपनी विरासत
अपने-अपने विचार
अपने-अपने आचरण और व्यवहार

सभी कोे प्रिय हैं
फूल और तितलियाँ
नदी, पहाड़ और इन्द्रधनुष
सभी को व्यापती है
भूख और प्यास
सभी का है एक जैसा
जीवन का व्यास

फिर क्यों बने रहते हैं काँटे
नफरत के, अलगाव के
छिपाव और दुराव के
हम-प्याला, हम-निवाला हैं हम सभी
मुकम्मल इन्सान बनने की ज़द्दोजहद में
मुब्तिला हैं हम सभी

मानवता की
अनवरत यात्रा का यह मोड़
शान्ति के रथ का यह घुमाव
न जाने नज़र आयेगा कब?
इस अंतहीन महासमर में
अनन्त और अशेष शुभकामनायें हैं
तुम्हारे लिये पास मेरे
खर्च लेना
जब जरूरी समझो, तब
ओ! मेरी अजन्मी पीढ़ी
मेरे अजन्मे वारिस!

मृत्यु गीत

रमने लगा है मन
गहन वन में
अदृश्य जंजीरों से fबंधी देह
हाथों से फिसल रही है
फिसल रही है
स्मृतियों के अंक-पाश से
क्षण / हर क्षण

मिला थोड़ा सा साथ
शब्दों का
माना अनुशासन भावों ने
मर्यादित होने लगीं भावनायें
मिटने लगा सब कुछ
कुछ बनने में
घिरने लगा घेरता दुख
कुछ रचने में
अपार जल में डूबता-उतराता
झुलस रहा है सब कुछ
कण / हर कण

दिखती हैं
तिमिर के प्रकाश में
आँसुओं की मुस्कानें
सिहराती है बंधनों में बंद
निर्बन्ध थकान
दौड़ रहा जब से छुआ वातायन
विश्रान्ति है मृत्यु तो
एक अनिवार्य अर्ध-विराम
अनवरत गान का
बहते रहते हैं भवितव्य में
जन / हर जन

प्रश्नोत्तर का रुका चक्र

इस उत्तर के आगे
होगा प्रश्न मौन
आज तक तो मौन है
उत्तर
इस प्रश्न का
कि कौन है जो
सूरज को चारा बनाकर
फाँसता है सृष्टि को
हमारी भाषा में
दिन-दहाड़े

बड़े सबेरे शिकार पर
निकलता है कौन
जानवर का विलोम
प्रातः तो होती है
वरदान / जीवन की
अभय, उमंग और
जगाने / अपने-अपने स्पंदन
जीवन की सुबह होती है
वस्तुतः सुबह

सुबह बुनती है
कई जाल / इन्द्रधनुषों के
सारी गतियों को
दिशाओं सहित
कौन कर लेता है कैद
सूरज को चारा बनाकर
मौन है उत्तर

विवश नहीं है
उत्तर देने को उत्तर
इस महाभारत में
उस धर्मराज सा
दशों-दिशाओं
चौदह भुवनों को
ताकने का दावा करते
धृतराष्ट्रों का युग है यह
सर्वज्ञाता / सर्वदृष्टा
अंधों का युग है यह
दाद पर दाद दे रहे हैं
बहरे / गूँगी आलापों पर

सब कुछ चलता है
सब कुछ ढकता है
जिन्दगी और मौत
रोजमर्रा के खेल-तमाशे
किसके लिये रचाये जाते हैं
तमाशाओं / उत्सवो के खेल
भीड़ तो बढ़ी है
दरबारियों की
संख्या राजाओं की अलबत्ता
लगभग स्थिर है

मौसम के तगादे
हराम कर दें जीना
चक्कर पर चक्कर
सूरज / चाँद
दिन / रात
हवा / पानी
सागर की लहरों सा
उतार - चढ़ाव
इतने चक्कर
कौन खिलाता है
इस जनम के चक्कर में
जन्म-जन्मांतर की कथा
कौन सुनाता है


कौन चाहत के चक्के पर
नचाता है सब को / लट्टू सा
अलग-अलग आकार लेती
पास होती / दूर होती
मिट्टियाँ / लचीलापन खोते-खोते
किसी ब्लैक-होल द्वारा
लील ली जायेंगी
ये ब्लैक-होल
बनाता है कौन
उत्तर फिर
मौन का मौन

कभी-कभी कहता है
उत्तर भी
उस वक्त सुनता है कौन
और कौन का कौन
उत्तर रह जाता
मौन का मौन

झपकियाँ लेने लगा सूरज

सब कुछ ठंडा होता जा रहा है
और मौसम सर्दतर
ठंडा होता जा रहा है अहसास

काटने लगा है समय
मोह बढ़ता जा रहा है
सुबह से / शाम से
समय-पात्र की रेत
अल्पसंख्यक हो रही है

अभियुक्त नजर आने लगा है
गवाह के कटघरे में
खतरों की छत्रछाया है
कुछ भी नहीं साफ-सुथरा
माया की माया है

जब साँस लेने के लिये
पेंचीदा होती हवा सी हवा हो
तब आती / गर्म रखती
विश्वास की गंध सौंधी
स्मृतियों की गहन गुफा में
टहलती / बूढ़ी दादी सी
जिसकी रोक-टोक से
तब हिलते थे मेरे पर

जिजिविषा को जिन्दा रखने
जिन्दा रखने ज़मीर को
अब भी टिका हूँ बाज़ार में
सम्हालते-थामते
मूल्यों के अवमूल्यन की दर

चलनी में छनने का समय
पास दिखता है
बिखरेंगे / तब न उगेंगे बीज
समय लगता है
बर्फ को पिघलने में
दुनिया को बदलने में

Sunday, October 23, 2011

आवश्यकताओं का समानुपात

सब कुछ होता जाता है शान्त
शाम के साथ / धीरे-धीरे
इतना शान्त कि
पड़ने लगती है सुनाई
आवाज सन्नाटे की

देर रात
घर का दरवाजा खोलता हूँ मैं
कुछ देर टहलने बाहर
सन्नाटे के साथ
मेरे भीतर के शोर को
कुछ तो मिले संगत / सन्नाटे की

बरामदे में लेटा कुत्ता
हो जाता विस्थापित
मेरी मात्र आहट से
पहले भोंकता था
फिर कूकने लगा
अब हट जाता है खामोश

एक झेंप महसूस करता
चेहरा मेरा
टोकता ज़मीर
आखिर कर दिया ना उतना ही बड़ा कुकृत्य
जितना करती है एक हवेली
एक बगीचे के लिये

घर की व्यवस्था में
जोड़ी मैने एक उपधारा
रात्रि को कोई भी न खोले
बारबार मुख्य दरवाजा
नई पीढ़ी तुरन्त सुर में आई
जरूरत में भी नहीं?
मैंने कहा - जरूर
जरूरत हो / तब ही

आवश्यकताओं का समानुपात है एक अनिवार्यता
अपनी आवश्कताओं के साथ
दूसरों की आवश्यकताओं का जितना ख्याल
उतनी ही सुसंस्कृत होती है सभ्यता

हर किसी को मिलनी चाहिये
दुनिया में उसकी गुफा
उसका कोना
और उसका होना

बुलबुलों में कैद हम सब


साबुन के बुलबुले
अब फैल गये आकाश तक
अपने-अपने बुलबुलों में कैद
देख-परख रहे हैं
अपने-अपने रंगों की दुनिया
हम सब / सब के सब

बचपन में जब-तब / गाहे-बगाहे
फूट जाते थे बुलबुले
आँखों से ओझल हों
पहले इसके / शुरू हो जाते थे
बनाने के उपक्रम / एक और बुलबुला सही

अब फेफड़ों का दम निकलता है
दर्शन सहज था कभी
अब प्रदर्शन / दिग्दर्शन का जमाना है
बुलबुले जितना ही
जमाने का ठिकाना है

कितनी बार
कितनी-कितनी बार /
तिनके बटोरे कोई
पंख थक जाते हैं
बुलबुलों से
धरा से उठते हम गगन तक
बुलबुलों से बिखर जाते हम

अभी सकून है
बुलबुले के अन्दर
जो हमारी रचना है
कितने भी होते जाओ भारी-भरकम
क्या बचना है!

बचाओ साँसें
इतनी मज़बूत
बनाते रह सको
बुलबुलों के बाद बुलबुले
बचाओ हिम्मत / जुटाओ हौसला
रख सको तो रखो / ढँका हुआ
अपने बुलबुलों से
किसी और का बनाया हुआ
बचपने का
साबुन का बुलबुला

गत गढ़ता है आगत


इतिहास से सबक
लेने की कला
नहीं सीख पाये आज तक
इसीलिये न / कहते हैं
दोहरा जाता है / स्वयं को
इतिहास

मैंने तो नहीं मांगी कभी
शान्ति
कैसा लगेगा शान्त समंदर
झींगुर बिन रात / और जंगल
शान्त

कौन मानेगा
किलकारियों ्र खिलखिलाहटों
से होता है प्रदूषण
गूंगी कर दोगे क्या
चिड़िया

अतीत की आवाजें
रखनी होंगी बचाकर
प्रगति के चमचमाते पथों की
पूर्वज हैं
पगडंडियाँ

जाने कब मिलेगी मंजिल
कदम की पहली धमक
रखे साथ में
मानो / और जानो
मंत्र

इतिहास के झरोखे से
सीखे झांकना
जमे रहें पाँव
पृथ्वी पर / आज की
ज्यादा दिखेगा साफ
कल आने वाला
चाँद

गत गढ़ता है आगत को
जीवन जलता है
स्वागत को
बात रहे / और साथ रहे
रात बहे / और तैरे दिन
देह में जैसे
आँख


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...


Saturday, October 22, 2011

समुद्र, चाँद और मैं


मौन के बिना
शब्द खो देते हैं
अपने अर्थ
कोई न सुने
तो कहना
हो जाता है
कितना व्यर्थ

मौन रहता है चाँद
बिना शोर किये
हमारी दुनिया में
उतरती है चाँदनी

समुद्र रहता है गरजता
उफनता
लहरों से भेजता रहता है
लगातार संदेश

सागर की तड़फ
बिफरना देख
सागर का
टीस उठती जैसे
टकरा रहा हो
सिर मेरा
किर्च-किर्च
किनारों से

मैं सोचता
कभी हो जाता हूँ
मैं समुद्र
कभी चाँद मैं

टटोलता हूँ मैं
कितना
बचा रह पाता
मुझमें मैं

समुद्र के पास
होता है जाना
किसी का नहीं होता समुद्र
चाँद होता है बहुत दूर
पर होता है सबका

नहीं होता हर समय
चाँद हर किसी का
पहूँच सको पास तो
बना रहता है साथ
हर समय
समुद्र का, चाँद का
और मुझसे मेरा

समुद्र की असीमितता
अक्सर हार जाती है
मेरी प्यास से
चाँद की शीतलता
कहाँ पार पा पाती है
मेरी आग से

चाँदनी से लपकती हैं
मेरी ओर अग्नि-शिखायें
जब होता हूँ मैं
पास से पास
चाँदनी से धुले समुद्र के
और दूर से दूर
तुम्हारी आँच के

जुहू पर
कब्ज़ा है बाज़ार का
न समुद्र बचा
न समुद्र पर
तैर कर आती
नम हवा
बिजली की
चौंधियाती रौशनी ने
निगल लिया अस्तित्व
चाँद का
समूचा का समूचा
दुःख से काला पड़ गया
चेहरा समुद्र का
शरद पूनम की रात को

सम्हाल कर रखे
सपनों की अँगुलियाँ पकड़े
समुद्र की साक्षी में
चाँदनी को निहारने
मेरी खुली आँखों को
दिखता, घनघोर अँधेरा

दुखते दिल के घावों पर
नमक मल जाती आवाज़
भारी पड़ती
समुद्र की आवाज तक पर
आवाज़
मालिशवालों की
भेल पूरी /पाव-भाजी
बेचने वालों की

भरे पेटों को
कहाँ सुनाई पड़ती हैं
खाली पेटों की
गर्जनायें

समुद्र की ही ओर होती है
पीठ उनकी
चाँदनी और बिजली की
मिली-जुली चमक
और भी ज्यादा
पारदर्शी कर देती है
पेट की भूख को
जो निगल ली जाती है
जिस्मानी-रूहानी भूखों द्वारा
ठाठ से, आन-बान-शान से

बाज़ार में,
सब कुछ मिलता है
इन्सान का जिस्म पलता है
बाजार में बिक कर
चाँद को निहारने वाली निगाहें
चोरी छिपे और बिन्दास भी
उतरने लगती हैं
जिस्म की घाटियों में

अपनी नदी
अपने गाँव की चाँदनी
हमजोलियों के ठहाके
कविताई,
और कभी गुनगुनाये
गीतों की स्मृतियों की
तह उघाड़ते
मैं समुद्र और चाँद छोड़कर
भारी कदमों से
लौट आता हूँ
अपनी किराये की
अस्थायी कब्र में
दुबकने के लिये

सब कुछ जहाँ
सुनिश्चित होता है
अनुभूति होती है मुझे
जैसे बदल गया मैं
जीवाश्म में
कट गया प्रकृति से
परिवर्तित होते रहने की
प्रवृत्ति से

जहाँ भारी पर्दे
मुझको काट कर
अलग कर देते हैं
अस्थिर चाँद से
स्पन्दित समुद्र से
और अविश्लेष्य
स्वयं मुझसे

मैं एकाकार
होना चाहता था
समुद्र की साक्षी में
चाँदनी से
सब,
अलग-थलग पड़ गये
वह भी
शरद-पूनम की रात
चाँद, समुद्र और मैं भी

जिन्दगी का साया


पर्वतों के
कई राज हैं
कई कहानियाँ हैं
नदियों के पास
छिपी रहती है आग
स्मृतियों के जंगल में
कौन खोज और बुझा पाया

बसने के पहले
खूब भटका है आदमी
रुकने के पहले
खूब दौड़ा है आदमी
शब्दों की मशालों ने
दूर से ही
पगडंडियों के काँटों को दिखाया

कुछ ख़ास देखा नहीं
कुछ विशेष सुना नहीं
न ही जान पाया कुछ
जो भी हाथ आया
सीप / मोती / काँटे या फूल
खुद-ब-खुद आया

आसमान छल है
इसीलिये तारे लुभावने
कितनी विशाल है
माया की काया
काल घनघोर घुमावदार गलियारा
तितलियों ने खूब छकाया

खेल हैं सूरज के सारे
इन्द्रधनुषों के जाल
और परदे बादलों के खूब पसारे
तीखी धूप का धमकना जबरिया
जिन्दगी का पता नहीं
कितना लम्बा है साया


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

Friday, October 21, 2011

उड़ान और सीमा


जिन चीजों को
छू सकते हैं हम
उन्हें खो देते हैं

कभी नहीं मिलतीं
कुछ चीजें / जिन्हें
छूना चाहते हैं हम
मसलन खुशी
हमारे बाद का हमारा समय
और तितली भी

क़ागज की नाव
बचपन की पहली रचना
पहली तकनीक सिद्धता
उसी नाव पर अब लादते हैं शब्द
कुछ चुनकर / कुछ अनगढ़ / कुछ अनचाहे

कुछ हैं जो छूना चाहते हैं इसे
पर कभी नहीं मिलती / फिर कभी
कागज की नाव
जिसके बहने के साथ
बह जाती है निजता
बह जाता है हक़ मालिकाना
शब्दों की सवारी का
क्या ठिकाना

नहीं सीख पाये हम
स्मृतियों को छूना
जब जी चाहे / जिसे चाहें

स्मृतियाँ अपनी इच्छा से
आती जाती हैं
नहीं सीख पाया मैं
स्मृतियों को लुभाने के लिये
आज तक
कोई एक नाव बनाने की कला

सकुचाते हैं हाथ बुद्धि के
सिकुड़ जाते हैं
जब स्मृतियाँ आती हैं पास

संतोष बस इतना ही
डर नहीं / स्मृतियों के खो जाने का
क्योंकि खो देते हैं हम / उन चीजों को
छू देते हैं जिन्हें

चाहते हुये भी छू नहीं पाते
मसलन प्रकाश
हमारे अज्ञान की सीमा
और क्षितिज भी

अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

ममता का स्वेटर

बचपन की बहुत सी यादों के साथ
एक काली, बुनी हुई स्वेटर
आज भी चिपकी रहती है
मेरे तन-मन से
कितनी भी ठंड हो
नहीं लगती मुझे

उसके एक-एक फंदे में
पिरोई हुई है ममता
उसके एक-एक रेशे में
गंध है उष्ण दूध की
नज़र न लगे किसी की
कोई उठाईगीर उठा न ले
मेरा समृद्ध संसार
छीन न ले उसे मुझसे
इसीलिये सबकी निगाहों से छिपाकर
अंदर ही पहनता हूँ उसे
सीने से सटाये
अपनी मौसी के सीने से
स्वयं को सटा हुआ महसूस करने के लिये

उसे पहन कर बन जाता हूँ मैं
फिर एक किशोर
माँ की गोद से उड़ कर
मौसी की बाहों में सिमटा
नहीं आते कोई डरावने स्वप्न
नींद आती है भरपूर
लगता मानों थपथपा रही है
मेरी मौसी मेरी पीठ
और मुँदने लगती है आँखें स्वतः ही

जब से गई है मौसी
इस धरा को छोड़ कर
वह काली स्वेटर
और अधिक गर्माने लगी है
अहसास से पुरसकून नहीं होती
कोई भी चीज

मेरा प्यार कहता
मुझे दे दो यह स्वेटर
मैं बंद कर दूँगी इसके छेद
सँवार दूँगी सारी उधेड़न
यह धरोहर है किसी की
इसे जतन से सम्भालो

मुझ प्रौढ़ के अंदर
जाग जाता वही हठी किशोर
जो छूने भी नहीं देता अपनी
कोई भी चीज, किसी को भी

मालूम है मुझे
मिलेगी मेरी मौसी मुझे
कभी किसी और दुनिया में
वही फिर बुनेगी इस स्वेटर को
दुबारा मेरे लिये
वहाँ का मौसम, वहाँ की ज़रूरतें
अपने बच्चे के लिये
कौन जान सकता है
माँ से भला ज्यादा

साथ कुछ नहीं जाता
ऐसा सुना और पढ़ा है
सारी नेमतों, दुआओं और
कर्मों के बदले
मैं ले जाना चाहता हूँ
यह स्वेटर साथ अपने

इसे अंतिम इच्छा कहें, वसीयत कहें
इसे मानें मेरे बाद वारिस मेरे
मेरे साथ रखें मेरी स्वेटर
मेरी सुनिश्चित और ज्ञात अंतिम यात्रा में
एक अनबूझी नई यात्रा में
थपकियों से भरी गर्माहट के लिये

जानता हूँ मैं
जितना मैं व्यग्र हूँ
उससे कहीं अधिक परेशान होगी वहाँ
मेरी मौसी
मेरी स्वेटर सुधारने के लिये

अनिर्णीत अनजाना खेल

रात के गर्भ से जनमता रहता है
अनवरत सूरज
मिटाने अँधेरा
अँधेरा मिटता कहाँ है
दूर नहीं होता
छिप जाता है सिर्फ

चाह बस इतनी
थोड़ी सी नमी / ठंडक थोड़ी सी
और थोड़ी सी गर्मी
जनम जाये / जीवन जरा सा

सब कुछ ठीक-ठाक नहीं घटता
हर बार / कई बार

मायावी हों मंजिलें
रफू़चक्कर हों रास्ते
हौसला मुट्ठियों में सिमटी रेत हो
चक्कर खत्म नहीं होते सूरज के
छिपाछुली के खेल में

नहीं पकड़ा गया अँधेरा
आज तक
सूरज तक के मुखौटे हैं
पास इसके
दीपक के नीचे ही
बैठा रहता है
आस्तीन में साँप की तरह

संस्कृतियों / सभ्यताओं की
कई-कई धुनों की बीन
बज रही है अनवरत
कब होगा पूरा
खेलता कौन है
बच्चों से / बचकाने खेल

पहरे सितारों के
हवाओं की गश्त
जीवन और मृत्यु
मध्यावकाश हैं
दौड़-दौड़ के सूरज की
फूल चुकी साँस है

हारता हाहाकार
देहरी तक आने में
आँसू लाचार
जम गई मुस्कान है
अपनी जीत-हार से
छिपे खिलाड़ी
कुछ ज्यादा परेशान हैं

अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

Thursday, October 20, 2011

समुद्र चॉंद और मैं (कविता संग्रह) : अशोक सिंघई

पिछले दिनों हमने छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ.परदेशीराम वर्मा जी की छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास आवा को ब्‍लॉग के रूप में प्रस्‍तुत किया और उसके संबंध में आरंभ में एक परिचय पोस्‍ट लिखा। पाठकों में श्री रविशंकर श्रीवास्‍तव जी की टिप्‍पणी आई कि छत्‍तीसगढ़ के साहित्‍यकारों की रचनाओं को आनलाईन प्रस्‍तुत करने के लिए अलग-अलग ब्‍लॉग बनाने के बजाए किसी एक ही जगह पर इन्‍हे प्रस्‍तुत किया जाए ताकि पाठकों को एक ही जगह पर छत्‍तीसगढ़ के रचनाकारों की रचनांए सुलभ हो सके। हमने इस ब्‍लॉग को गूगल बुक्‍स में उपलब्‍ध छत्‍तीसगढ़ के रचनाकारों की पुस्‍तकों को एक जगह प्रस्‍तुत करने के उद्देश्‍य से बनाया था, रवि भाई के सुझाव नें हमें बल दिया और अब हम इसे आपके लिये पुन: नियमित रूप से प्रस्‍तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें हम क्रमिक रूप से छत्‍तीसगढ़ के साहित्‍य को प्रकाशित करेंगें। आज पहली कड़ी में प्रदेश के वरिष्‍ठ कवि श्री अशोक सिंघई जी की कविता संग्रह समुद्र, चॉंद और मैं की पहली कविता प्रस्‍तुत कर रहे हैं। अशोक जी की एक कविता संग्रह सुन रही हो ना को हम पूर्व में आनलाईन यहॉं प्रस्‍तुत कर चुके हैं। 

सपनों का खंडहर

कैसे तय होता है आखिरी पल
हमारे समय का / आखिरी पल
संदर्भ में हमारे समय के / समय का
हमारे लिये आखिरी वंशज
जो हमारे साथ जीता है
और जाती है जिसकी आखिरी सॉंस
हमारी आखिरी सॉंस के साथ

एक सॉंस की जिन्दगी भी नहीं
आखिरी पल के पास
उस आखिरी एक पल में ही
विद्रूपता के साथ
पूछ ही लेता है आखिरी पल
क्या मिली तुमको भी
एक भी भरी-पूरी सॉंस

न जाने कितनी सॉसों के रेले में
हर बार दिल से छू-छू कर
तला्यता तुमको / रुका कहाँ
भागता रहा हर सॉंस / तुमसे मिलने
ओ मेरी आखिरी सॉंस!

क्या तुम्हीं हो / वह भरपूर सॉंस
सुध-बुध ले ले / इतनी मादकता
विलोप की गोपनीयता
नचिकेता की प्रथमांतिम जिज्ञासा
गुह्य ललचाते अंधकार की आत्मजा
क्या मेरे कलयुग की विड्ढकन्या हो तुम

क्या आत्मा भी भटक जाती
कितनी ही जीवन रेखाओं पर चल-चल कर
क्या आत्मा ही नहीं लेती निर्णय
त्यागने का / एक और मुखैाटा
कैैसे करती होंगी अनगिन आत्मायें
एक साथ / आखिरी पल से
मिलने का सौदा
एक ही भूगोल पर गोलबंद होकर

क्या होता है
उस आखिरी पल में
अभी तक तो
कोई नहीं आ पाया बताने
उस अंधी गुफा के भेद

अचानक लोप हो जाता
हमारे द्वारा पैदा किया हुआ कृत्रिम प्रकाश
प्राकृतिक अंधा उज़ाला
बदल जाता प्रकाशवान अंधकार में
अँधेरों में झाँकने की ताकत
कम हो गई है अब / हम सभी की
कहाँ समझ पा रहे हैं हम / अँधेरे के प्रकाश को
कहाँ भेद पा रहे हैं हम / प्रकाश के अंधकार को

अचानक लोप हो जायेगा
भाग खड़ा होगा / एक दिन सूरज
वह आखिरी दिन
उसी आखिरी पल की यात्रा
भटकाती है अंधी गुफा में
रूठ कर भागते सूरज को
निगाह में रखने की जद्दोज़हद ही ज़िन्दगी है
पता नहीं कौन-सा चरण है / इस रिले-रेस का
धावति-धावति का अधुनातन यंत्र
विधना ने रचा क्यों
हमारे युग में षड़यंत्र

कौन जाने कब गया बदल
चरैवेति-चरैवेति का वेद मंत्र
कौन जाने कब हुई पहल / थाम लिया
हाथों में धावति-धावति का
अधुनातन यंत्र

सपनों के खण्डहरों पर
ताज़पो्यी होती इतिहास की
स्मृतियों की नावों पर
महत्वाकांक्षाओं का पाल तान
घूमते हम सदियों-सदियों
देख खण्डहर अपने सपनों के
दहलते / सिर धुनते / उन बच्चों से
जिनके रेत के घरौंदो को
लात मारकर निकल जाता
एक ज्यादा बिगड़ा हुआ
कोई बड़ा बच्चा

आँसुओं का स्वाद
ताक़ीद करता उस वसीयत की
जो समुन्दर की तरह खुला है
और बहुत कुछ गोपन भी

महसूस होती है एक नई ताकत
जागती है एक नई ज़िद
सूखते नहीं आँसू
सूखते होते तो कहाँ बनता समुन्दर
आँसू ही तो बदलते हैं चट्टानों को
रेत में / और हम लगते हैं बनाने
फिर-फिर घरौंदे / रेत के

रहेंगे बनाते
जब तक साथ है हिम्मत
जब तक साथ है सागर
और सूरज भी

अशोक सिंघई


सिंघई जी का परिचय -

अशोक सिंघई , राजभाषा प्रमुख, ‘सेल’ भिलाई इस्पात संयंत्र
जन्म: 25 अगस्त, 1951, नवापारा (राजिम) जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़
पिता: सवाई सिंघई  श्री धन्ना लाल जैन
माता: स्व. श्रीमती सोमती बाई जैन
शिक्षादीक्षा: एम एस-सी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी), बी एड
सेवायें: 1973 में एम.एस-सी रसायन शास्त्र की उपाधि ग्रहण करने के तत्काल बाद मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में 1973 से 1982 शिक्षक। फरवरी 1982 में नन्दिनी खदान में सहायक शिक्षक (गणित) के रूप में पदस्थी के साथ भिलाई इस्पात संयंत्र से जुड़े। 1983 में व्याख्याता (रसायन शास्त्र) के रूप में पदोन्नत एवं खुर्सीपार उ.मा.वि.-2 में पदस्थी। 83-84 में कैम्प-1 हाईस्कूल में स्थानान्तरण। जून 1984 में प्रबंधन प्रशिक्षार्थी (प्रशासन) में चयन। प्रशिक्षण के बाद संयंत्र के जन सम्पर्क विभाग में जूनियर मैनेजर के रूप में नियुक्ति और सहायक महाप्रबंधक (जन सम्पर्क) तक प्रोन्नत हुये। 4 वर्षों तक जन सम्पर्क प्रमुख का पद सम्हालने के बाद सम्प्रति राजभाषा प्रमुख का दायित्व।  
प्रकाशन:  (1) ‘अलविदा बीसवीं सदी’ (120 पृष्ठों की प्रदीर्घ कविता)
                (2) ‘सम्भाल कर अपनी आकाशगंगा’ (काव्य संग्रह)
                (3) ‘धीरे धीरे बहती है नदी’ (काव्य संग्रह)
                (4) ‘सुन रही हो ना!’ (काव्य संग्रह)
प्रकाश्य: कवि के हाथ और संसार (काव्य संग्रह)
सम्पर्क: अशोक सिंघई, 7बी/सड़क-20/सेक्टर-5/भिलाई (छत्तीसगढ़) 490 006
दूरभाष: (0788) 2227877/2894934 (कार्यालय)
             (0788) 2228122/2898065 (निवास)
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