Monday, October 24, 2011

अंतहीन महासमर

कहती है कोई लोक-कथा
बहुत-बहुत समय पहले
समय से पहले
धरती के बहुत पास था आसमान
धरती पर घिसटता था आदमी
छाया रहता था घटाटोप
जिसे अब कहते हैं अँधेरा

कुछ पखेरूओं ने परखा, देखा-भाला
समझा आसमान के खोखलेपन को
बीने कुछ तिनके
और ढकेला आसमान को
ऊपर, और ऊपर
पहल हुई, पहली बार
सिर उठाने की
हाथों को धरती पर टेक
उठ खड़ा हुआ आदमी
चलने लगा, लगा दौड़ने भी

दर्शन हुये सूरज के
दिखने लगा दूर-दूर तक
शुरू हुआ चक्र
शक्तियों की अभिवृद्धि का
इfन्द्रयों की
सुरक्षा, जीवन की रक्षा ने
सिखाया अनुभवों को सहेजना
समूहों मे रहना

बाँटना सीखा मनुष्य ने
बनाये रखने समूहगत प्रतिबद्धता को
गढ़ उसने
अभिव्यक्ति और संवाद की अभिक्रियायें
संकेत बनाये, बुनी भाषायें
रचे स्तुति-गान, ग्रन्थ और मान्यतायें
सूरज की अमरता और निरन्तरता ने
सशरीर अवतरित किया धरा पर
गोपन ईश्वर के निर्वासित वंशज को

अग्नि पर अधिकार से
अपनी मुट्ठियों में रख लिया सूरज
समूची प्रकृति से अलग हटकर
खड़ा हो गया आदमी
अगोपन नियन्ता बनकर

एक-दूसरे की वेदना से
जन्मी हर एक में
संवेदना, कृतज्ञता और अपनापन
जनमने लगे मानवीय गुण
आकार लेने लगीं व्यवस्थायें

घोसलों ने सिखाया घर बनाना
प्रकृति ने दी रंगों की तमीज
दी कलाओं की विविधतायें
कायम रखते हुये वैयक्तिता
साधी सामाजिकता सामूहिकता की
परिभाषित किये सम्बन्ध
और किया सम्बन्धों का विस्तार

अंगों को ढककर मनुष्य ने की
सर्वशक्तिमान से पहली बगावत
किया पहला हस्तक्षेप
प्रकृति की व्यवस्था में
बनाई अपनी एक अलग ही दुनिया
शुरू हुआ एक अंतहीन महासमर
आदि से, व्याधि से, अदृश्य समाधि से

लापता हो गया सर्वशक्तिमान
अश्वस्थामा सा
मृत्यु तक को तरसता
अमरता से अभिशापित
मानव जय-यात्रा हेतु अनिवार्य पाथेय
सम्भवतः बिजूके सा
आवश्यक सर्वशक्तिमान
सुनिश्चित मानव की ही परिकल्पना
और इधर असंहारित परीक्षित
लेते रहे जन्म अनवरत
निर्बल भी बचने लगे
सुरक्षित, संरक्षित और विकासमान
सामूहिकता के कवच में
अपने बनाये बसेरे में

सुख की निश्चिन्त नींद सोने लगा
सदियों पहले धरा पर घिसटता आदमी
दुःस्वप्न सा अँधेरा रोज आता घेरने
एक अविजित चुनौती के रूप में आज भी
टूट पड़ता अशरीरी आसमान
निगलता सूर्य को

फिर बटोरने लगते पखेरू
अनुभवों के, ज्ञान के, विज्ञान के
प्रज्ञा के तिनके
रहते उठाते ऊपर आसमान को
सिर ऊपर उठा ही रहे सर्वदा
सूरज रहे चमकता, करता आलोकित
समय-पथ को

मनुष्य के अंतस् में
घटता रहता यही सब कुछ
अँधेरे की शाश्वता के खिलाफ
अंदर-बाहर अंतहीन है यह महासमर
जाने-अनजाने, देखे-अनदेखे
अपरिचित-सुपरिचित रिपुओं से
मनुष्य के अंतस् में हैं
प्रकृति, मित्र, शत्रु सभी कुछ
और बाहर भी, दिन-रात जैसे

एक बड़े प्याले में
भरी है हवा
उसी में से
हम सभी निगलते रहते हैं
और उगलते भी
वही एक ही, प्राणदायिनी हवा
इस तरह हम सब की
जूठी है,
और स्वीकार्य है
हम सभी को, यह जूठी
वही एक ही, विश्व-व्यापनी हवा

चाहे हों किसी भी देश-विदेश के
किसी भी रंग और रूप के
किसी भी गैबी ताकत के सामने झुके
किसी भी बोली-भाषा में गाते, बुदबुदाते
एक ही धरती पर
टिके हैं हम सभी
साझा है इस तरह हमारा स्पर्श
टिके हुये रहते हैं हम सभी के पैर
एक ही धरती पर
और स्वीकार्य है सभी को
यह साझा आधार

एक ही आकाशगंगा है हमारी
समायें हैं जिसमें हम सभी
जैसे समाये रहते थे
बचपन में
किसी पोखर किसी नदी-नाले
या तालाब में
एक-दूसरे पर जल उछालते
हँसते-खेलते-मुस्कुराते
इस तरह साझी है मुस्कान
हम सभी की

एक ही तो है
आसमान हमारा
सभी के हैं
सूरज-चाँद-तारे
मौसमी अवगुंठनों से
झाँकते नज़ारे
बारिश बटती है सभी को
बराबर-बराबर
सभी को मिलती है धूप और चाँदनी
बिना किसी भेद-भाव के

सभी के लिये है
हमारा अर्जित ज्ञान / अनुभव
हमारी पुस्तकें
यहाँ तक कि सभ्यता और संस्कृति तक
इतिहास में दर्ज नहीं है
कोई भी युद्ध अब तलक
इस बटवारे के विवाद में

लगभग एक से होते हैं
मानवीय सम्बन्ध-सूत्र
एक सी ममता
एक सा पितृत्व
एक सा बन्धुत्व
एक सा प्यार
एक सा दुलार
एक सा निहार

सभी के पास है
अपनी-अपनी विरासत
अपने-अपने विचार
अपने-अपने आचरण और व्यवहार

सभी कोे प्रिय हैं
फूल और तितलियाँ
नदी, पहाड़ और इन्द्रधनुष
सभी को व्यापती है
भूख और प्यास
सभी का है एक जैसा
जीवन का व्यास

फिर क्यों बने रहते हैं काँटे
नफरत के, अलगाव के
छिपाव और दुराव के
हम-प्याला, हम-निवाला हैं हम सभी
मुकम्मल इन्सान बनने की ज़द्दोजहद में
मुब्तिला हैं हम सभी

मानवता की
अनवरत यात्रा का यह मोड़
शान्ति के रथ का यह घुमाव
न जाने नज़र आयेगा कब?
इस अंतहीन महासमर में
अनन्त और अशेष शुभकामनायें हैं
तुम्हारे लिये पास मेरे
खर्च लेना
जब जरूरी समझो, तब
ओ! मेरी अजन्मी पीढ़ी
मेरे अजन्मे वारिस!

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