Thursday, October 20, 2011

समुद्र चॉंद और मैं (कविता संग्रह) : अशोक सिंघई

पिछले दिनों हमने छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ.परदेशीराम वर्मा जी की छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास आवा को ब्‍लॉग के रूप में प्रस्‍तुत किया और उसके संबंध में आरंभ में एक परिचय पोस्‍ट लिखा। पाठकों में श्री रविशंकर श्रीवास्‍तव जी की टिप्‍पणी आई कि छत्‍तीसगढ़ के साहित्‍यकारों की रचनाओं को आनलाईन प्रस्‍तुत करने के लिए अलग-अलग ब्‍लॉग बनाने के बजाए किसी एक ही जगह पर इन्‍हे प्रस्‍तुत किया जाए ताकि पाठकों को एक ही जगह पर छत्‍तीसगढ़ के रचनाकारों की रचनांए सुलभ हो सके। हमने इस ब्‍लॉग को गूगल बुक्‍स में उपलब्‍ध छत्‍तीसगढ़ के रचनाकारों की पुस्‍तकों को एक जगह प्रस्‍तुत करने के उद्देश्‍य से बनाया था, रवि भाई के सुझाव नें हमें बल दिया और अब हम इसे आपके लिये पुन: नियमित रूप से प्रस्‍तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें हम क्रमिक रूप से छत्‍तीसगढ़ के साहित्‍य को प्रकाशित करेंगें। आज पहली कड़ी में प्रदेश के वरिष्‍ठ कवि श्री अशोक सिंघई जी की कविता संग्रह समुद्र, चॉंद और मैं की पहली कविता प्रस्‍तुत कर रहे हैं। अशोक जी की एक कविता संग्रह सुन रही हो ना को हम पूर्व में आनलाईन यहॉं प्रस्‍तुत कर चुके हैं। 

सपनों का खंडहर

कैसे तय होता है आखिरी पल
हमारे समय का / आखिरी पल
संदर्भ में हमारे समय के / समय का
हमारे लिये आखिरी वंशज
जो हमारे साथ जीता है
और जाती है जिसकी आखिरी सॉंस
हमारी आखिरी सॉंस के साथ

एक सॉंस की जिन्दगी भी नहीं
आखिरी पल के पास
उस आखिरी एक पल में ही
विद्रूपता के साथ
पूछ ही लेता है आखिरी पल
क्या मिली तुमको भी
एक भी भरी-पूरी सॉंस

न जाने कितनी सॉसों के रेले में
हर बार दिल से छू-छू कर
तला्यता तुमको / रुका कहाँ
भागता रहा हर सॉंस / तुमसे मिलने
ओ मेरी आखिरी सॉंस!

क्या तुम्हीं हो / वह भरपूर सॉंस
सुध-बुध ले ले / इतनी मादकता
विलोप की गोपनीयता
नचिकेता की प्रथमांतिम जिज्ञासा
गुह्य ललचाते अंधकार की आत्मजा
क्या मेरे कलयुग की विड्ढकन्या हो तुम

क्या आत्मा भी भटक जाती
कितनी ही जीवन रेखाओं पर चल-चल कर
क्या आत्मा ही नहीं लेती निर्णय
त्यागने का / एक और मुखैाटा
कैैसे करती होंगी अनगिन आत्मायें
एक साथ / आखिरी पल से
मिलने का सौदा
एक ही भूगोल पर गोलबंद होकर

क्या होता है
उस आखिरी पल में
अभी तक तो
कोई नहीं आ पाया बताने
उस अंधी गुफा के भेद

अचानक लोप हो जाता
हमारे द्वारा पैदा किया हुआ कृत्रिम प्रकाश
प्राकृतिक अंधा उज़ाला
बदल जाता प्रकाशवान अंधकार में
अँधेरों में झाँकने की ताकत
कम हो गई है अब / हम सभी की
कहाँ समझ पा रहे हैं हम / अँधेरे के प्रकाश को
कहाँ भेद पा रहे हैं हम / प्रकाश के अंधकार को

अचानक लोप हो जायेगा
भाग खड़ा होगा / एक दिन सूरज
वह आखिरी दिन
उसी आखिरी पल की यात्रा
भटकाती है अंधी गुफा में
रूठ कर भागते सूरज को
निगाह में रखने की जद्दोज़हद ही ज़िन्दगी है
पता नहीं कौन-सा चरण है / इस रिले-रेस का
धावति-धावति का अधुनातन यंत्र
विधना ने रचा क्यों
हमारे युग में षड़यंत्र

कौन जाने कब गया बदल
चरैवेति-चरैवेति का वेद मंत्र
कौन जाने कब हुई पहल / थाम लिया
हाथों में धावति-धावति का
अधुनातन यंत्र

सपनों के खण्डहरों पर
ताज़पो्यी होती इतिहास की
स्मृतियों की नावों पर
महत्वाकांक्षाओं का पाल तान
घूमते हम सदियों-सदियों
देख खण्डहर अपने सपनों के
दहलते / सिर धुनते / उन बच्चों से
जिनके रेत के घरौंदो को
लात मारकर निकल जाता
एक ज्यादा बिगड़ा हुआ
कोई बड़ा बच्चा

आँसुओं का स्वाद
ताक़ीद करता उस वसीयत की
जो समुन्दर की तरह खुला है
और बहुत कुछ गोपन भी

महसूस होती है एक नई ताकत
जागती है एक नई ज़िद
सूखते नहीं आँसू
सूखते होते तो कहाँ बनता समुन्दर
आँसू ही तो बदलते हैं चट्टानों को
रेत में / और हम लगते हैं बनाने
फिर-फिर घरौंदे / रेत के

रहेंगे बनाते
जब तक साथ है हिम्मत
जब तक साथ है सागर
और सूरज भी

अशोक सिंघई


सिंघई जी का परिचय -

अशोक सिंघई , राजभाषा प्रमुख, ‘सेल’ भिलाई इस्पात संयंत्र
जन्म: 25 अगस्त, 1951, नवापारा (राजिम) जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़
पिता: सवाई सिंघई  श्री धन्ना लाल जैन
माता: स्व. श्रीमती सोमती बाई जैन
शिक्षादीक्षा: एम एस-सी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी), बी एड
सेवायें: 1973 में एम.एस-सी रसायन शास्त्र की उपाधि ग्रहण करने के तत्काल बाद मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में 1973 से 1982 शिक्षक। फरवरी 1982 में नन्दिनी खदान में सहायक शिक्षक (गणित) के रूप में पदस्थी के साथ भिलाई इस्पात संयंत्र से जुड़े। 1983 में व्याख्याता (रसायन शास्त्र) के रूप में पदोन्नत एवं खुर्सीपार उ.मा.वि.-2 में पदस्थी। 83-84 में कैम्प-1 हाईस्कूल में स्थानान्तरण। जून 1984 में प्रबंधन प्रशिक्षार्थी (प्रशासन) में चयन। प्रशिक्षण के बाद संयंत्र के जन सम्पर्क विभाग में जूनियर मैनेजर के रूप में नियुक्ति और सहायक महाप्रबंधक (जन सम्पर्क) तक प्रोन्नत हुये। 4 वर्षों तक जन सम्पर्क प्रमुख का पद सम्हालने के बाद सम्प्रति राजभाषा प्रमुख का दायित्व।  
प्रकाशन:  (1) ‘अलविदा बीसवीं सदी’ (120 पृष्ठों की प्रदीर्घ कविता)
                (2) ‘सम्भाल कर अपनी आकाशगंगा’ (काव्य संग्रह)
                (3) ‘धीरे धीरे बहती है नदी’ (काव्य संग्रह)
                (4) ‘सुन रही हो ना!’ (काव्य संग्रह)
प्रकाश्य: कवि के हाथ और संसार (काव्य संग्रह)
सम्पर्क: अशोक सिंघई, 7बी/सड़क-20/सेक्टर-5/भिलाई (छत्तीसगढ़) 490 006
दूरभाष: (0788) 2227877/2894934 (कार्यालय)
             (0788) 2228122/2898065 (निवास)
चलित दूरभाष: 099071 82061
फैक्स: (0788) 2222890/2223491

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रयास है यह तो। बधाई और आभार।

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  2. संजीव भैया, हमेशा की तरह आपका यह काम भी स्तुत्य है। निश्चित रूप से इससे जहां हमारे प्रदेश् का साहित्य स्ंरक्षित होगा, वहीं पाठकों को एक मंच पर महान और बेहतरीन साहित्य के पठन का अवसर भी मिलेगा। पुन: साधुवाद।
    अनुपम सिंह

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  3. अपने प्रदेश के साहित्य को प्रोत्साहित करना , उसके रंग से सबको परिचित कराना ,सभी संस्कृतियों को करीब लाना एक तरह से व्यक्ति को व्यक्ति से जोडना ही है ! इस सराहनीय प्रयास के लिए शुभकामनायें !

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हमारा यह प्रयास यदि सार्थक है तो हमें टिप्‍पणियों के द्वारा अवश्‍य अवगत करावें, किसी भी प्रकार के सुधार संबंधी सुझाव व आलोचनाओं का हम स्‍वागत करते हैं .....

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