Sunday, October 23, 2011

बुलबुलों में कैद हम सब


साबुन के बुलबुले
अब फैल गये आकाश तक
अपने-अपने बुलबुलों में कैद
देख-परख रहे हैं
अपने-अपने रंगों की दुनिया
हम सब / सब के सब

बचपन में जब-तब / गाहे-बगाहे
फूट जाते थे बुलबुले
आँखों से ओझल हों
पहले इसके / शुरू हो जाते थे
बनाने के उपक्रम / एक और बुलबुला सही

अब फेफड़ों का दम निकलता है
दर्शन सहज था कभी
अब प्रदर्शन / दिग्दर्शन का जमाना है
बुलबुले जितना ही
जमाने का ठिकाना है

कितनी बार
कितनी-कितनी बार /
तिनके बटोरे कोई
पंख थक जाते हैं
बुलबुलों से
धरा से उठते हम गगन तक
बुलबुलों से बिखर जाते हम

अभी सकून है
बुलबुले के अन्दर
जो हमारी रचना है
कितने भी होते जाओ भारी-भरकम
क्या बचना है!

बचाओ साँसें
इतनी मज़बूत
बनाते रह सको
बुलबुलों के बाद बुलबुले
बचाओ हिम्मत / जुटाओ हौसला
रख सको तो रखो / ढँका हुआ
अपने बुलबुलों से
किसी और का बनाया हुआ
बचपने का
साबुन का बुलबुला

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