Tuesday, November 1, 2011

दूध का कर्ज

अपनी जान से बढ़कर चाहते हैं
जिन्हें हम
हमारी औलादें
अपनी शिक्षा में बड़ी नफ़ासत के साथ
हम लादते जाते हैं
उन पर फर्ज-दर-फर्ज

अपने ही अंशों तक से व्यापार
मुहावरे गढ़ डाले
खोल डाला दूध तक का खाता
मांढ़ दिया औलादों पर
दूध का कर्ज

परवान चढ़ाते हैं
मजबूत करते हैं उनके पर
दिखाते हैं आसमान
दिखाते हैं सितारे
कहते हैं, दमको चाँद-तारों की तरह
पर बाँधकर रखना चाहते हैं
उनके पैरों को
अपने घोंसलों के तिनकों से

बांधकर नैतिकताओं और परम्पराओं -
के ढकोसलों से सजी अदृश्य जंजीरों से
मांगने लगते हैं ब्याज समेत
अपनी एक-एक थपकी का खर्च

वैसे अपनी बची-खुची जिन्दगी
रेहन रख दी होती है हमने
आशाओं की अदायगी में
अपने सपनों की तिज़ारत में
नीलाम कर देते है हम
ममता के विरल/तरल अहसास को

मौत की यकीनी
तल्ख़ करने लगती है
fजंदगी के जाम की
चंद बचीं घूँटें
व्यर्थ लगने लगता है
सारा हिसाब-किताब

दरअसल व्यर्थ है हमारी आशायें
लादल हैं हमारे सपने
प्रायोजित है हमारी शिक्षा
षड़यंत्र है जीवन की ऐसी व्यवस्था

दुनिया धड़ाके से नहीं बदलती
गाते रहो / लिखते रहो
बकते रहो । सिकते रहो
हाँक पाड़ते-पाड़ते
मेरी तो गूँगी पड़ने लगी है जुबान
दुनिया फिर भी नहीं सम्हलती
फिर भी जारी रखूँगा
भंगिमाओं से ही देता रहूँगा बयान

एक दिन आयेगा
जब सूरज के उगने पर
बगावत करके
सिकुड़ने के लिये
कमल खिलने से
कर देंगे इंकार

उस दिन की नज़र उतारने
वैसे मेरे पास तो नहीं है कोई खाता
यदि कुछ दर्ज हो कहीं
किसी और के खाते में
तो आज मैं
अपने बच्चों के सारे कर्ज
मुआफ करता हूँ
गुजरे जमानों की गर्द झाड़ कर
लेन-देन का गंधाता
सदियों पुराना
रिश्तों वाला बस्ता साफ करता हूँ

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