Monday, October 31, 2011

जीवन में रंग

इतना रक्त बहा
मिट्टी का रंग लाल है

हमारे घर / सफेदी का लिबास ओढ़े
छिपाते हैं रंग
होते रहते हैं बदरंग
फेंकती रहती है पानी के छींटे
खेलती मानव से प्रकृति

वैसे तो सारे रंग मिलते हैं
खोज लिया आखिर शिशु ने
माँ की छाती में कहीं न कहीं
मिट्टी सफेद
और जाना / लाल रंग
होता है / अंदर ही अच्छा
हरा / भर जाता है हर घाव
आसमान नीला / नीली झीलें
पीला बसंत
मटमैली कर देती है वर्षा
और हवा भी रंग जाती है
कभी कभी

काले बादल
जब छुपाते चाँद
एक प्यार की अंगुली
बादलों को समझाती-सुलझाती
दिखलाती है जरा सी झलक
नीलम नयन की
लाल लाल रंगों के बीच
खिल उठते मोती सफेद
इसी क्षण ने
दोहराया होगा आदमी को
बिखरा लो / फैला दो इस रंग को
अपने नीड़ के अन्दर बाहर

सही रंगों का सही ज़गह होना
ज़रूरत है जीवन की
सही रंगों को सही ज़गह रखना
इबादत है जीवन की

हर कालजयी संस्कृति और सभ्यता के
नीचे बहती है एक काली नदी
खून की
एक न एक दिन
होयेगी सारी मिट्टी सफेद
जब भविष्य धो सकेगा
बहा सारा लहू इतिहास का

तब कोई नहीं छिपायेगा मुँह
न ही लटकायेगा मुखौटे
अन्दर-बाहर / घर-दुकान
रंगने के काम से भी
मुक्त हो जायेगा आदमी

तब भी क्या नहीं लगेंगे रंग ज़रूरी
न ही होगी चाह मन में
सिहरन का स्वाद दोहराने की
क्या अप्रासंगिक हो जायेगा प्यार
क्या अनावश्यक हो जायेगा अपनापन
रंगों का बाँध बना
क्या रंगों को बाँध लेगा आदमी
क्या रंगों को बाँट लेगा आदमी?

नहीं! इतनी सामर्थ्‍य मत देना कभी
माँ की छाती पर घूमता शिशु
रहे खेलता / हँसता / रोता
जागता / सोता / सपनों में विचरता
यही तो है जीवन की आत्मा
जीवन का अमरत्व
और निरन्तर अमृत-मंथन

सभ्यता के कलेवर
बदले हैं / सदियों में समय ने
आत्मा तक को पहुँची है ठेस
रंग मरहम हैं
जीवन है तब तक
जब तक हैं
जीवन में रंग

अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

एक और प्रकाशोत्सव

वैसे तो दीपावली की शाम
कुछ ज्यादा ही कर जाती है उदास
खुशी से अधिक प्रकाशित होती है कसक
जो होते हैं पास अपने
उनसे ज्यादा खलती है कमी उनकी
जो नहीं होते पास

एक अतिरिक्त प्रकाश
दौड़ाता है अतृप्त मन को
उन अँधेरों में
जहाँ छिपी हैं स्मृतियाँ
हाँफता है, काँपता है मन
कुछ ज्यादा ही दीपावली की रात

घूमता मैं थिरकते, किलकते बाजार में
ग़ालिब की तरह गैरख़रीदार
मुफ़लिसी की मस्ती नहीं
न ही दीवाने-ज़ुनून
नहीं पूछता फुलझड़ियों के भाव
मेरे लिये सूना-सूना सा है
विश्व हो या गाँव

दीपों से झिलमिलाती शाम
यौवनित रात्रि हो जाती है
कम्प्यूटर पर लिखता मैं / वह सब
जो जो इतिहास बनता
महसूसने का
वर्तमान के त्रिशंकु सा
मैं भवितव्य को तरसता
तरसता सपनों के सच होने को
खुशियों की हद होने को

जिसके लिये खरीदता था
कुछ गिन-गिन कर
कुछ छाँट-छाँट कर
कुछ रोशनी, कुछ धमाके
उसके हाथ अब खेलने लगे हैं नश्तर से
दर्द के बिस्तर से लगा
बैठा रहता है अब वह
पोंछने अनजान आँखों के आँसू
और भर आती हैं
उसकी माँ की आँखें
यहाँ राह तकते
इस झिलमिलाती नदी में दिखते
मेरी दीपावली के
तैरते उदास दीप

मेरा हृदय घिर जाता धमाकों में
बहुत बहुत थका सा लौटता
अकेला घिरता जाता मैं
असंख्य दीपों के बीच
अपने दिये को खोजती मेरी आँखें
अटक जातीं एक चादर ओढ़े
मेरी तरह अशान्ति को ओढ़े
मन को दबोचे
एक बचपन पर

योगी सा बैठा एक बचपन
देखता आकाश को विदग्ध करते
असंख्य क्षणिक तारे
दीपों से झिलमिलाते
न जाने किसकी धरती के नज़ारे
घुटनों पर ठुट्ठी टिकाये
समाधिस्थ मन
और मैं बदल जाता आकाश में
दिखने लगते मुझे ऐसे ही समाधिस्थ
नितान्त मेरे टिमटिमाते दीप असंख्य

कम थी पहले मेरे पास
फटाके जुटाने की सामथ्यZ
और अब विभ्रमित है मन
योगियों को बाँटू मुस्कानें
या फिर जुगत जुटाऊँ
दीपधर्म की राह सिखाऊँ
अपने मन को सीखूँ ढकना
बादलों को दूँ विदा

पर कम हैं नश्तर
पकड़ा दूँ जिन्हें ऐसे ही हाथों में
कम हैं आँसू
भर दूँ जिन्हें ऐसी ही आँखों में
संकल्पित जिजीविषा को पालूँ-पोसूँ
समय की धोने कालिख
हाथों से दीपक छोड़ूँ

दीप से अब भी
जल जाते हैं दीप
खंगालने होते हैं
चंद मोतियों को चुनने से पहले
पहाड़ भर सीप

सीखने को वसुन्धरा है
निभाने को परम्परा है
एक और प्रकाशोत्सव

Friday, October 28, 2011

सूरज बनाम रोटी

कितना मिलता है सूरज
रोटी से हमारी

सूरज को देखकर
महसूस कर उसकी आँच
शक्ति उसकी
उसकी स्थिर चाल
मनुष्य ने खाना चाहा उसे
शक्ति को सीधे हजम करने की
कोशिशें कीं
पकाये खूब पुलाव ख्याली

तलाशे फल गोल गोल
खाये लाल लाल
फल सूरज जैसे
किये शिकार
कुछ सफेद लाल गोश्त
कुछ गर्म लाल रुधिर
नहीं बनी कुछ बात
भरा नहीं मन

नियमितता सीखी सूरज से
सूरज से सीखा सबको अपनाना
सदियों में जाना
श्रम का अफ़साना
जोड़ा नाता मिट्टी से
जोड़े जल के हाथ
कुछ किया पवन का साथ
सीखा बोना सूरज को

रोज टहलने आता सूरज
चिढ़ाता, तपता तमतमा कर
छिपता बादलों में
जल से करता बातें कुछ
रोकता उसे भरमा कर
फिर छिपता, लम्बा सुस्ताता
चाँद की चिक से झाँकता
कौतूहल जब जागता

मनुष्य नियमित नहीं
सूरज की तरह सुस्ताने में
जुटा रहता बेरा-कुबेरा
जुगनुओं की गवाही में
सूर्योंे की फसलें सँवारता
सूरज की आहट से पहले ही
उठ जाता / तलाशने अपने सूरज
तराशने अपने सूरज

इसीलिये
कितना मिलता है सूरज
रोटी से हमारी

Thursday, October 27, 2011

आबू की बेटियाँ

दयार्द्र लगीं मुझे बहुत ही
आबू पर्वत की ऋंखलायें
हरी-भरीं
स्थिर पहाड़ों पर दौड़तीं
जल-धारायें

ढॅक लेते उतरते / उतराते बादल
और बादलों पर पैर रखता मैं
तत्काल जान जाता कि
कितने खोखले होते हैं
ऊपर बहने वाले
गरजने और बरसने वाले
जीवन देने का दावा करते
श्वेत-कपसीले बादल

फक्क सफेद-सफेद धुँध से
नहीं ढॅकते सिर्फ आबू पर्वत के शीर्ष
ढॅकी रहती है
प्रकृति-रूपा सभी और सब कुछ

अमूमन धरती पर
कुछ भी नहीं होता सफेद
श्वेत दैवीयता के लक्षणों में चिन्हित है
श्वेत पंकज, श्वेत हंस और शुचिता

मुझे दिख जाती हैं
आबू पर्वत की बेटियों की हथेलियाँ
श्रम के स्वेद से धुलती हथेलियाँ
और मैं तय नहीं कर पाता
कि धुँध ज्यादा सफेद है
आश्रम-कुमारियों के वस्त्र / कुछ अजन्मे स्वप्न
या फिर आबू पर्वत की बेटियों की हथेलियाँ

हाँ! मैं तयशुदा जानता हूँ कि
कौन सी सफेदी
सबसे अधिक है
निश्छल और पवित्र

Wednesday, October 26, 2011

लापता ईश्वर के नाम एक और सम्मन

हमारे हर सुखों की आँख में
हमेशा के लिये
मेहमान कर दिये अक्षर आँसू
हमारे हर दुःखों की घड़ियों में
हटा दिया कंधे पर से
एक सहारा

समझाया जाता है
बहुत कुछ घट जाता है
असाता कर्मों के उदय से
जिनके अस्त होने की
नहीं होती कोई घटनात्मक सूचना
बस उदय होते हैं
ऋण के लेखे-जोखे

जनम तो होते हैं सबके
अलग-अलग
किस हिसाब से मौत हो जाती है
बहुतों की एकसाथ
गड़बड़ है सारा लेखा-जोखा
साफ नहीं है कर्मों का हिसाब
सिर्फ ऋण ही दिखते हैं
आत्मा की चमड़ी तक
उतार लेने वाले
ओ, बेईमान सूदखोर
कहते हैं तुझको पाना
नितांत व्यक्तिगत है
जिसे बाँट न सकें हम
वह पाना भी क्या पाना है
मानवता बाँटने पर टिकी है
और तू! अलगाने पर टिका है

अगर एक है तू
और सब कुछ तेरा ही किया-धरा है
भूख-प्यास, मरण-जनम,
दुःख-सुख, माया-काया
तो बड़ा क्रूर खिलाड़ी है तू
हमारे आँसूओं के सागर पर
मुस्कानों की अपनी नाम-नाव चलाने वाले
तुझको भी कुछ जानना शेष है

बू आने लगती है आदमी को
किसी भी पुरानी होती व्यवस्था से
तेरी व्यवस्था सड़ गई है
रंग उतरने लगे हैं तेरे षड़यंत्रों के
कलई उतर गई है तेरे ईश्वरत्व की

विद्रोही होता है पहले कवि
लगाता रहता है नश्तर
व्यवस्था के संभावी नासूरों पर
तेरी मायावी दुनिया को ठोकरों पर रखता है कवि
तेरे जालों पर रखे दानों पर थूकता है कवि
तेरे वरदानों की बारिश को नकारता है कवि
गलती तो सबसे होती है
तूने ही बनाया पपीहा
और तूने ही नक्षत्र स्वाति
आशा और इंतजार
यहीं चूक गया तू

मैं भी जानता हूँ भवितव्य
वह घड़ी जरूर आयेगी
तू भी मरेगा एक दिन
आशंकित हूँ मैं
अच्छा हो तू बना ही रहे
पुनर्जन्म में और भी बिगड़ेगी बात
तेरे कर्म कुछ खास अच्छे नहीं रहे

साहित्य का वंशज है अध्यात्म
समझो साहित्य का पुनर्जन्म ही
तेरे सोने की लंकाओं में
कैद होकर रह गई हैं
अध्यात्म की सीतात्मायें

हमारे हर युद्ध तूने ही लड़े
ऐसा बना रखा है तूने
धर्म के इतिहास को
अगर तू एक है
कब तक, और कितने बनाते रहेगा राम
बासन्देश तूने खुद कहा है
रावण भी तेरा ही खेल है

अजीब गोरखधंधा है
हमारे ही वेश में आकर
हमारे रुधिर से बनाता अपना पुष्पक विमान
अपनी जनता, अपना सिंहासन
और अग्नि-परीक्षित सीता
निरन्तर निर्वासन ही निर्वासन
तारतम्य टूटने से ही जनमती है
एक नई दुनिया

कवि होता है अराजक
खड़ा करता है हर व्यवस्था को
कटघरे में
बढ़ रही हैं तेरी मनमानियाँ
मैं अक्षर-किसान
नहीं डरता किसी से
अपने-आप से भी
तुझसे तो कभी नहीं डरा मैं

अन्याय के खिलाफ़
लड़ सकता हूँ किसी से भी
मैं हारता हूँ या जीतता हूँ
पर बना हूँ
मैदान-ए-ज़ंग में

और तू है
समय से पहले समय का लापता
अश्वत्थामा सा कायर
छुपकर पीठ पर वार करने आदतन आदी
समस्त विशेषणों का भक्षक
मेरी ही अजर-अमर भस्मासूरी रचना
अगर वस्तुतः नियामक बन बैठा है तो
प्रथम-दृष्टया दोषी है तू
इस बार वायदा-माफ गवाह
नहीं बन पावेगा तू

मैं तेरे नाम जारी करता हूँ सम्मन
पेश हो! अदीबों के रूबरु
अक्षर की अदालत में
 बाअदब, बामुलाहज़ा हाज़िर हो!


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

Monday, October 24, 2011

अंतहीन महासमर

कहती है कोई लोक-कथा
बहुत-बहुत समय पहले
समय से पहले
धरती के बहुत पास था आसमान
धरती पर घिसटता था आदमी
छाया रहता था घटाटोप
जिसे अब कहते हैं अँधेरा

कुछ पखेरूओं ने परखा, देखा-भाला
समझा आसमान के खोखलेपन को
बीने कुछ तिनके
और ढकेला आसमान को
ऊपर, और ऊपर
पहल हुई, पहली बार
सिर उठाने की
हाथों को धरती पर टेक
उठ खड़ा हुआ आदमी
चलने लगा, लगा दौड़ने भी

दर्शन हुये सूरज के
दिखने लगा दूर-दूर तक
शुरू हुआ चक्र
शक्तियों की अभिवृद्धि का
इfन्द्रयों की
सुरक्षा, जीवन की रक्षा ने
सिखाया अनुभवों को सहेजना
समूहों मे रहना

बाँटना सीखा मनुष्य ने
बनाये रखने समूहगत प्रतिबद्धता को
गढ़ उसने
अभिव्यक्ति और संवाद की अभिक्रियायें
संकेत बनाये, बुनी भाषायें
रचे स्तुति-गान, ग्रन्थ और मान्यतायें
सूरज की अमरता और निरन्तरता ने
सशरीर अवतरित किया धरा पर
गोपन ईश्वर के निर्वासित वंशज को

अग्नि पर अधिकार से
अपनी मुट्ठियों में रख लिया सूरज
समूची प्रकृति से अलग हटकर
खड़ा हो गया आदमी
अगोपन नियन्ता बनकर

एक-दूसरे की वेदना से
जन्मी हर एक में
संवेदना, कृतज्ञता और अपनापन
जनमने लगे मानवीय गुण
आकार लेने लगीं व्यवस्थायें

घोसलों ने सिखाया घर बनाना
प्रकृति ने दी रंगों की तमीज
दी कलाओं की विविधतायें
कायम रखते हुये वैयक्तिता
साधी सामाजिकता सामूहिकता की
परिभाषित किये सम्बन्ध
और किया सम्बन्धों का विस्तार

अंगों को ढककर मनुष्य ने की
सर्वशक्तिमान से पहली बगावत
किया पहला हस्तक्षेप
प्रकृति की व्यवस्था में
बनाई अपनी एक अलग ही दुनिया
शुरू हुआ एक अंतहीन महासमर
आदि से, व्याधि से, अदृश्य समाधि से

लापता हो गया सर्वशक्तिमान
अश्वस्थामा सा
मृत्यु तक को तरसता
अमरता से अभिशापित
मानव जय-यात्रा हेतु अनिवार्य पाथेय
सम्भवतः बिजूके सा
आवश्यक सर्वशक्तिमान
सुनिश्चित मानव की ही परिकल्पना
और इधर असंहारित परीक्षित
लेते रहे जन्म अनवरत
निर्बल भी बचने लगे
सुरक्षित, संरक्षित और विकासमान
सामूहिकता के कवच में
अपने बनाये बसेरे में

सुख की निश्चिन्त नींद सोने लगा
सदियों पहले धरा पर घिसटता आदमी
दुःस्वप्न सा अँधेरा रोज आता घेरने
एक अविजित चुनौती के रूप में आज भी
टूट पड़ता अशरीरी आसमान
निगलता सूर्य को

फिर बटोरने लगते पखेरू
अनुभवों के, ज्ञान के, विज्ञान के
प्रज्ञा के तिनके
रहते उठाते ऊपर आसमान को
सिर ऊपर उठा ही रहे सर्वदा
सूरज रहे चमकता, करता आलोकित
समय-पथ को

मनुष्य के अंतस् में
घटता रहता यही सब कुछ
अँधेरे की शाश्वता के खिलाफ
अंदर-बाहर अंतहीन है यह महासमर
जाने-अनजाने, देखे-अनदेखे
अपरिचित-सुपरिचित रिपुओं से
मनुष्य के अंतस् में हैं
प्रकृति, मित्र, शत्रु सभी कुछ
और बाहर भी, दिन-रात जैसे

एक बड़े प्याले में
भरी है हवा
उसी में से
हम सभी निगलते रहते हैं
और उगलते भी
वही एक ही, प्राणदायिनी हवा
इस तरह हम सब की
जूठी है,
और स्वीकार्य है
हम सभी को, यह जूठी
वही एक ही, विश्व-व्यापनी हवा

चाहे हों किसी भी देश-विदेश के
किसी भी रंग और रूप के
किसी भी गैबी ताकत के सामने झुके
किसी भी बोली-भाषा में गाते, बुदबुदाते
एक ही धरती पर
टिके हैं हम सभी
साझा है इस तरह हमारा स्पर्श
टिके हुये रहते हैं हम सभी के पैर
एक ही धरती पर
और स्वीकार्य है सभी को
यह साझा आधार

एक ही आकाशगंगा है हमारी
समायें हैं जिसमें हम सभी
जैसे समाये रहते थे
बचपन में
किसी पोखर किसी नदी-नाले
या तालाब में
एक-दूसरे पर जल उछालते
हँसते-खेलते-मुस्कुराते
इस तरह साझी है मुस्कान
हम सभी की

एक ही तो है
आसमान हमारा
सभी के हैं
सूरज-चाँद-तारे
मौसमी अवगुंठनों से
झाँकते नज़ारे
बारिश बटती है सभी को
बराबर-बराबर
सभी को मिलती है धूप और चाँदनी
बिना किसी भेद-भाव के

सभी के लिये है
हमारा अर्जित ज्ञान / अनुभव
हमारी पुस्तकें
यहाँ तक कि सभ्यता और संस्कृति तक
इतिहास में दर्ज नहीं है
कोई भी युद्ध अब तलक
इस बटवारे के विवाद में

लगभग एक से होते हैं
मानवीय सम्बन्ध-सूत्र
एक सी ममता
एक सा पितृत्व
एक सा बन्धुत्व
एक सा प्यार
एक सा दुलार
एक सा निहार

सभी के पास है
अपनी-अपनी विरासत
अपने-अपने विचार
अपने-अपने आचरण और व्यवहार

सभी कोे प्रिय हैं
फूल और तितलियाँ
नदी, पहाड़ और इन्द्रधनुष
सभी को व्यापती है
भूख और प्यास
सभी का है एक जैसा
जीवन का व्यास

फिर क्यों बने रहते हैं काँटे
नफरत के, अलगाव के
छिपाव और दुराव के
हम-प्याला, हम-निवाला हैं हम सभी
मुकम्मल इन्सान बनने की ज़द्दोजहद में
मुब्तिला हैं हम सभी

मानवता की
अनवरत यात्रा का यह मोड़
शान्ति के रथ का यह घुमाव
न जाने नज़र आयेगा कब?
इस अंतहीन महासमर में
अनन्त और अशेष शुभकामनायें हैं
तुम्हारे लिये पास मेरे
खर्च लेना
जब जरूरी समझो, तब
ओ! मेरी अजन्मी पीढ़ी
मेरे अजन्मे वारिस!

मृत्यु गीत

रमने लगा है मन
गहन वन में
अदृश्य जंजीरों से fबंधी देह
हाथों से फिसल रही है
फिसल रही है
स्मृतियों के अंक-पाश से
क्षण / हर क्षण

मिला थोड़ा सा साथ
शब्दों का
माना अनुशासन भावों ने
मर्यादित होने लगीं भावनायें
मिटने लगा सब कुछ
कुछ बनने में
घिरने लगा घेरता दुख
कुछ रचने में
अपार जल में डूबता-उतराता
झुलस रहा है सब कुछ
कण / हर कण

दिखती हैं
तिमिर के प्रकाश में
आँसुओं की मुस्कानें
सिहराती है बंधनों में बंद
निर्बन्ध थकान
दौड़ रहा जब से छुआ वातायन
विश्रान्ति है मृत्यु तो
एक अनिवार्य अर्ध-विराम
अनवरत गान का
बहते रहते हैं भवितव्य में
जन / हर जन

प्रश्नोत्तर का रुका चक्र

इस उत्तर के आगे
होगा प्रश्न मौन
आज तक तो मौन है
उत्तर
इस प्रश्न का
कि कौन है जो
सूरज को चारा बनाकर
फाँसता है सृष्टि को
हमारी भाषा में
दिन-दहाड़े

बड़े सबेरे शिकार पर
निकलता है कौन
जानवर का विलोम
प्रातः तो होती है
वरदान / जीवन की
अभय, उमंग और
जगाने / अपने-अपने स्पंदन
जीवन की सुबह होती है
वस्तुतः सुबह

सुबह बुनती है
कई जाल / इन्द्रधनुषों के
सारी गतियों को
दिशाओं सहित
कौन कर लेता है कैद
सूरज को चारा बनाकर
मौन है उत्तर

विवश नहीं है
उत्तर देने को उत्तर
इस महाभारत में
उस धर्मराज सा
दशों-दिशाओं
चौदह भुवनों को
ताकने का दावा करते
धृतराष्ट्रों का युग है यह
सर्वज्ञाता / सर्वदृष्टा
अंधों का युग है यह
दाद पर दाद दे रहे हैं
बहरे / गूँगी आलापों पर

सब कुछ चलता है
सब कुछ ढकता है
जिन्दगी और मौत
रोजमर्रा के खेल-तमाशे
किसके लिये रचाये जाते हैं
तमाशाओं / उत्सवो के खेल
भीड़ तो बढ़ी है
दरबारियों की
संख्या राजाओं की अलबत्ता
लगभग स्थिर है

मौसम के तगादे
हराम कर दें जीना
चक्कर पर चक्कर
सूरज / चाँद
दिन / रात
हवा / पानी
सागर की लहरों सा
उतार - चढ़ाव
इतने चक्कर
कौन खिलाता है
इस जनम के चक्कर में
जन्म-जन्मांतर की कथा
कौन सुनाता है


कौन चाहत के चक्के पर
नचाता है सब को / लट्टू सा
अलग-अलग आकार लेती
पास होती / दूर होती
मिट्टियाँ / लचीलापन खोते-खोते
किसी ब्लैक-होल द्वारा
लील ली जायेंगी
ये ब्लैक-होल
बनाता है कौन
उत्तर फिर
मौन का मौन

कभी-कभी कहता है
उत्तर भी
उस वक्त सुनता है कौन
और कौन का कौन
उत्तर रह जाता
मौन का मौन

झपकियाँ लेने लगा सूरज

सब कुछ ठंडा होता जा रहा है
और मौसम सर्दतर
ठंडा होता जा रहा है अहसास

काटने लगा है समय
मोह बढ़ता जा रहा है
सुबह से / शाम से
समय-पात्र की रेत
अल्पसंख्यक हो रही है

अभियुक्त नजर आने लगा है
गवाह के कटघरे में
खतरों की छत्रछाया है
कुछ भी नहीं साफ-सुथरा
माया की माया है

जब साँस लेने के लिये
पेंचीदा होती हवा सी हवा हो
तब आती / गर्म रखती
विश्वास की गंध सौंधी
स्मृतियों की गहन गुफा में
टहलती / बूढ़ी दादी सी
जिसकी रोक-टोक से
तब हिलते थे मेरे पर

जिजिविषा को जिन्दा रखने
जिन्दा रखने ज़मीर को
अब भी टिका हूँ बाज़ार में
सम्हालते-थामते
मूल्यों के अवमूल्यन की दर

चलनी में छनने का समय
पास दिखता है
बिखरेंगे / तब न उगेंगे बीज
समय लगता है
बर्फ को पिघलने में
दुनिया को बदलने में

Sunday, October 23, 2011

आवश्यकताओं का समानुपात

सब कुछ होता जाता है शान्त
शाम के साथ / धीरे-धीरे
इतना शान्त कि
पड़ने लगती है सुनाई
आवाज सन्नाटे की

देर रात
घर का दरवाजा खोलता हूँ मैं
कुछ देर टहलने बाहर
सन्नाटे के साथ
मेरे भीतर के शोर को
कुछ तो मिले संगत / सन्नाटे की

बरामदे में लेटा कुत्ता
हो जाता विस्थापित
मेरी मात्र आहट से
पहले भोंकता था
फिर कूकने लगा
अब हट जाता है खामोश

एक झेंप महसूस करता
चेहरा मेरा
टोकता ज़मीर
आखिर कर दिया ना उतना ही बड़ा कुकृत्य
जितना करती है एक हवेली
एक बगीचे के लिये

घर की व्यवस्था में
जोड़ी मैने एक उपधारा
रात्रि को कोई भी न खोले
बारबार मुख्य दरवाजा
नई पीढ़ी तुरन्त सुर में आई
जरूरत में भी नहीं?
मैंने कहा - जरूर
जरूरत हो / तब ही

आवश्यकताओं का समानुपात है एक अनिवार्यता
अपनी आवश्कताओं के साथ
दूसरों की आवश्यकताओं का जितना ख्याल
उतनी ही सुसंस्कृत होती है सभ्यता

हर किसी को मिलनी चाहिये
दुनिया में उसकी गुफा
उसका कोना
और उसका होना

बुलबुलों में कैद हम सब


साबुन के बुलबुले
अब फैल गये आकाश तक
अपने-अपने बुलबुलों में कैद
देख-परख रहे हैं
अपने-अपने रंगों की दुनिया
हम सब / सब के सब

बचपन में जब-तब / गाहे-बगाहे
फूट जाते थे बुलबुले
आँखों से ओझल हों
पहले इसके / शुरू हो जाते थे
बनाने के उपक्रम / एक और बुलबुला सही

अब फेफड़ों का दम निकलता है
दर्शन सहज था कभी
अब प्रदर्शन / दिग्दर्शन का जमाना है
बुलबुले जितना ही
जमाने का ठिकाना है

कितनी बार
कितनी-कितनी बार /
तिनके बटोरे कोई
पंख थक जाते हैं
बुलबुलों से
धरा से उठते हम गगन तक
बुलबुलों से बिखर जाते हम

अभी सकून है
बुलबुले के अन्दर
जो हमारी रचना है
कितने भी होते जाओ भारी-भरकम
क्या बचना है!

बचाओ साँसें
इतनी मज़बूत
बनाते रह सको
बुलबुलों के बाद बुलबुले
बचाओ हिम्मत / जुटाओ हौसला
रख सको तो रखो / ढँका हुआ
अपने बुलबुलों से
किसी और का बनाया हुआ
बचपने का
साबुन का बुलबुला

गत गढ़ता है आगत


इतिहास से सबक
लेने की कला
नहीं सीख पाये आज तक
इसीलिये न / कहते हैं
दोहरा जाता है / स्वयं को
इतिहास

मैंने तो नहीं मांगी कभी
शान्ति
कैसा लगेगा शान्त समंदर
झींगुर बिन रात / और जंगल
शान्त

कौन मानेगा
किलकारियों ्र खिलखिलाहटों
से होता है प्रदूषण
गूंगी कर दोगे क्या
चिड़िया

अतीत की आवाजें
रखनी होंगी बचाकर
प्रगति के चमचमाते पथों की
पूर्वज हैं
पगडंडियाँ

जाने कब मिलेगी मंजिल
कदम की पहली धमक
रखे साथ में
मानो / और जानो
मंत्र

इतिहास के झरोखे से
सीखे झांकना
जमे रहें पाँव
पृथ्वी पर / आज की
ज्यादा दिखेगा साफ
कल आने वाला
चाँद

गत गढ़ता है आगत को
जीवन जलता है
स्वागत को
बात रहे / और साथ रहे
रात बहे / और तैरे दिन
देह में जैसे
आँख


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...


Saturday, October 22, 2011

समुद्र, चाँद और मैं


मौन के बिना
शब्द खो देते हैं
अपने अर्थ
कोई न सुने
तो कहना
हो जाता है
कितना व्यर्थ

मौन रहता है चाँद
बिना शोर किये
हमारी दुनिया में
उतरती है चाँदनी

समुद्र रहता है गरजता
उफनता
लहरों से भेजता रहता है
लगातार संदेश

सागर की तड़फ
बिफरना देख
सागर का
टीस उठती जैसे
टकरा रहा हो
सिर मेरा
किर्च-किर्च
किनारों से

मैं सोचता
कभी हो जाता हूँ
मैं समुद्र
कभी चाँद मैं

टटोलता हूँ मैं
कितना
बचा रह पाता
मुझमें मैं

समुद्र के पास
होता है जाना
किसी का नहीं होता समुद्र
चाँद होता है बहुत दूर
पर होता है सबका

नहीं होता हर समय
चाँद हर किसी का
पहूँच सको पास तो
बना रहता है साथ
हर समय
समुद्र का, चाँद का
और मुझसे मेरा

समुद्र की असीमितता
अक्सर हार जाती है
मेरी प्यास से
चाँद की शीतलता
कहाँ पार पा पाती है
मेरी आग से

चाँदनी से लपकती हैं
मेरी ओर अग्नि-शिखायें
जब होता हूँ मैं
पास से पास
चाँदनी से धुले समुद्र के
और दूर से दूर
तुम्हारी आँच के

जुहू पर
कब्ज़ा है बाज़ार का
न समुद्र बचा
न समुद्र पर
तैर कर आती
नम हवा
बिजली की
चौंधियाती रौशनी ने
निगल लिया अस्तित्व
चाँद का
समूचा का समूचा
दुःख से काला पड़ गया
चेहरा समुद्र का
शरद पूनम की रात को

सम्हाल कर रखे
सपनों की अँगुलियाँ पकड़े
समुद्र की साक्षी में
चाँदनी को निहारने
मेरी खुली आँखों को
दिखता, घनघोर अँधेरा

दुखते दिल के घावों पर
नमक मल जाती आवाज़
भारी पड़ती
समुद्र की आवाज तक पर
आवाज़
मालिशवालों की
भेल पूरी /पाव-भाजी
बेचने वालों की

भरे पेटों को
कहाँ सुनाई पड़ती हैं
खाली पेटों की
गर्जनायें

समुद्र की ही ओर होती है
पीठ उनकी
चाँदनी और बिजली की
मिली-जुली चमक
और भी ज्यादा
पारदर्शी कर देती है
पेट की भूख को
जो निगल ली जाती है
जिस्मानी-रूहानी भूखों द्वारा
ठाठ से, आन-बान-शान से

बाज़ार में,
सब कुछ मिलता है
इन्सान का जिस्म पलता है
बाजार में बिक कर
चाँद को निहारने वाली निगाहें
चोरी छिपे और बिन्दास भी
उतरने लगती हैं
जिस्म की घाटियों में

अपनी नदी
अपने गाँव की चाँदनी
हमजोलियों के ठहाके
कविताई,
और कभी गुनगुनाये
गीतों की स्मृतियों की
तह उघाड़ते
मैं समुद्र और चाँद छोड़कर
भारी कदमों से
लौट आता हूँ
अपनी किराये की
अस्थायी कब्र में
दुबकने के लिये

सब कुछ जहाँ
सुनिश्चित होता है
अनुभूति होती है मुझे
जैसे बदल गया मैं
जीवाश्म में
कट गया प्रकृति से
परिवर्तित होते रहने की
प्रवृत्ति से

जहाँ भारी पर्दे
मुझको काट कर
अलग कर देते हैं
अस्थिर चाँद से
स्पन्दित समुद्र से
और अविश्लेष्य
स्वयं मुझसे

मैं एकाकार
होना चाहता था
समुद्र की साक्षी में
चाँदनी से
सब,
अलग-थलग पड़ गये
वह भी
शरद-पूनम की रात
चाँद, समुद्र और मैं भी

जिन्दगी का साया


पर्वतों के
कई राज हैं
कई कहानियाँ हैं
नदियों के पास
छिपी रहती है आग
स्मृतियों के जंगल में
कौन खोज और बुझा पाया

बसने के पहले
खूब भटका है आदमी
रुकने के पहले
खूब दौड़ा है आदमी
शब्दों की मशालों ने
दूर से ही
पगडंडियों के काँटों को दिखाया

कुछ ख़ास देखा नहीं
कुछ विशेष सुना नहीं
न ही जान पाया कुछ
जो भी हाथ आया
सीप / मोती / काँटे या फूल
खुद-ब-खुद आया

आसमान छल है
इसीलिये तारे लुभावने
कितनी विशाल है
माया की काया
काल घनघोर घुमावदार गलियारा
तितलियों ने खूब छकाया

खेल हैं सूरज के सारे
इन्द्रधनुषों के जाल
और परदे बादलों के खूब पसारे
तीखी धूप का धमकना जबरिया
जिन्दगी का पता नहीं
कितना लम्बा है साया


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

Friday, October 21, 2011

उड़ान और सीमा


जिन चीजों को
छू सकते हैं हम
उन्हें खो देते हैं

कभी नहीं मिलतीं
कुछ चीजें / जिन्हें
छूना चाहते हैं हम
मसलन खुशी
हमारे बाद का हमारा समय
और तितली भी

क़ागज की नाव
बचपन की पहली रचना
पहली तकनीक सिद्धता
उसी नाव पर अब लादते हैं शब्द
कुछ चुनकर / कुछ अनगढ़ / कुछ अनचाहे

कुछ हैं जो छूना चाहते हैं इसे
पर कभी नहीं मिलती / फिर कभी
कागज की नाव
जिसके बहने के साथ
बह जाती है निजता
बह जाता है हक़ मालिकाना
शब्दों की सवारी का
क्या ठिकाना

नहीं सीख पाये हम
स्मृतियों को छूना
जब जी चाहे / जिसे चाहें

स्मृतियाँ अपनी इच्छा से
आती जाती हैं
नहीं सीख पाया मैं
स्मृतियों को लुभाने के लिये
आज तक
कोई एक नाव बनाने की कला

सकुचाते हैं हाथ बुद्धि के
सिकुड़ जाते हैं
जब स्मृतियाँ आती हैं पास

संतोष बस इतना ही
डर नहीं / स्मृतियों के खो जाने का
क्योंकि खो देते हैं हम / उन चीजों को
छू देते हैं जिन्हें

चाहते हुये भी छू नहीं पाते
मसलन प्रकाश
हमारे अज्ञान की सीमा
और क्षितिज भी

अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

ममता का स्वेटर

बचपन की बहुत सी यादों के साथ
एक काली, बुनी हुई स्वेटर
आज भी चिपकी रहती है
मेरे तन-मन से
कितनी भी ठंड हो
नहीं लगती मुझे

उसके एक-एक फंदे में
पिरोई हुई है ममता
उसके एक-एक रेशे में
गंध है उष्ण दूध की
नज़र न लगे किसी की
कोई उठाईगीर उठा न ले
मेरा समृद्ध संसार
छीन न ले उसे मुझसे
इसीलिये सबकी निगाहों से छिपाकर
अंदर ही पहनता हूँ उसे
सीने से सटाये
अपनी मौसी के सीने से
स्वयं को सटा हुआ महसूस करने के लिये

उसे पहन कर बन जाता हूँ मैं
फिर एक किशोर
माँ की गोद से उड़ कर
मौसी की बाहों में सिमटा
नहीं आते कोई डरावने स्वप्न
नींद आती है भरपूर
लगता मानों थपथपा रही है
मेरी मौसी मेरी पीठ
और मुँदने लगती है आँखें स्वतः ही

जब से गई है मौसी
इस धरा को छोड़ कर
वह काली स्वेटर
और अधिक गर्माने लगी है
अहसास से पुरसकून नहीं होती
कोई भी चीज

मेरा प्यार कहता
मुझे दे दो यह स्वेटर
मैं बंद कर दूँगी इसके छेद
सँवार दूँगी सारी उधेड़न
यह धरोहर है किसी की
इसे जतन से सम्भालो

मुझ प्रौढ़ के अंदर
जाग जाता वही हठी किशोर
जो छूने भी नहीं देता अपनी
कोई भी चीज, किसी को भी

मालूम है मुझे
मिलेगी मेरी मौसी मुझे
कभी किसी और दुनिया में
वही फिर बुनेगी इस स्वेटर को
दुबारा मेरे लिये
वहाँ का मौसम, वहाँ की ज़रूरतें
अपने बच्चे के लिये
कौन जान सकता है
माँ से भला ज्यादा

साथ कुछ नहीं जाता
ऐसा सुना और पढ़ा है
सारी नेमतों, दुआओं और
कर्मों के बदले
मैं ले जाना चाहता हूँ
यह स्वेटर साथ अपने

इसे अंतिम इच्छा कहें, वसीयत कहें
इसे मानें मेरे बाद वारिस मेरे
मेरे साथ रखें मेरी स्वेटर
मेरी सुनिश्चित और ज्ञात अंतिम यात्रा में
एक अनबूझी नई यात्रा में
थपकियों से भरी गर्माहट के लिये

जानता हूँ मैं
जितना मैं व्यग्र हूँ
उससे कहीं अधिक परेशान होगी वहाँ
मेरी मौसी
मेरी स्वेटर सुधारने के लिये

अनिर्णीत अनजाना खेल

रात के गर्भ से जनमता रहता है
अनवरत सूरज
मिटाने अँधेरा
अँधेरा मिटता कहाँ है
दूर नहीं होता
छिप जाता है सिर्फ

चाह बस इतनी
थोड़ी सी नमी / ठंडक थोड़ी सी
और थोड़ी सी गर्मी
जनम जाये / जीवन जरा सा

सब कुछ ठीक-ठाक नहीं घटता
हर बार / कई बार

मायावी हों मंजिलें
रफू़चक्कर हों रास्ते
हौसला मुट्ठियों में सिमटी रेत हो
चक्कर खत्म नहीं होते सूरज के
छिपाछुली के खेल में

नहीं पकड़ा गया अँधेरा
आज तक
सूरज तक के मुखौटे हैं
पास इसके
दीपक के नीचे ही
बैठा रहता है
आस्तीन में साँप की तरह

संस्कृतियों / सभ्यताओं की
कई-कई धुनों की बीन
बज रही है अनवरत
कब होगा पूरा
खेलता कौन है
बच्चों से / बचकाने खेल

पहरे सितारों के
हवाओं की गश्त
जीवन और मृत्यु
मध्यावकाश हैं
दौड़-दौड़ के सूरज की
फूल चुकी साँस है

हारता हाहाकार
देहरी तक आने में
आँसू लाचार
जम गई मुस्कान है
अपनी जीत-हार से
छिपे खिलाड़ी
कुछ ज्यादा परेशान हैं

अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...

Thursday, October 20, 2011

समुद्र चॉंद और मैं (कविता संग्रह) : अशोक सिंघई

पिछले दिनों हमने छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ.परदेशीराम वर्मा जी की छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास आवा को ब्‍लॉग के रूप में प्रस्‍तुत किया और उसके संबंध में आरंभ में एक परिचय पोस्‍ट लिखा। पाठकों में श्री रविशंकर श्रीवास्‍तव जी की टिप्‍पणी आई कि छत्‍तीसगढ़ के साहित्‍यकारों की रचनाओं को आनलाईन प्रस्‍तुत करने के लिए अलग-अलग ब्‍लॉग बनाने के बजाए किसी एक ही जगह पर इन्‍हे प्रस्‍तुत किया जाए ताकि पाठकों को एक ही जगह पर छत्‍तीसगढ़ के रचनाकारों की रचनांए सुलभ हो सके। हमने इस ब्‍लॉग को गूगल बुक्‍स में उपलब्‍ध छत्‍तीसगढ़ के रचनाकारों की पुस्‍तकों को एक जगह प्रस्‍तुत करने के उद्देश्‍य से बनाया था, रवि भाई के सुझाव नें हमें बल दिया और अब हम इसे आपके लिये पुन: नियमित रूप से प्रस्‍तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें हम क्रमिक रूप से छत्‍तीसगढ़ के साहित्‍य को प्रकाशित करेंगें। आज पहली कड़ी में प्रदेश के वरिष्‍ठ कवि श्री अशोक सिंघई जी की कविता संग्रह समुद्र, चॉंद और मैं की पहली कविता प्रस्‍तुत कर रहे हैं। अशोक जी की एक कविता संग्रह सुन रही हो ना को हम पूर्व में आनलाईन यहॉं प्रस्‍तुत कर चुके हैं। 

सपनों का खंडहर

कैसे तय होता है आखिरी पल
हमारे समय का / आखिरी पल
संदर्भ में हमारे समय के / समय का
हमारे लिये आखिरी वंशज
जो हमारे साथ जीता है
और जाती है जिसकी आखिरी सॉंस
हमारी आखिरी सॉंस के साथ

एक सॉंस की जिन्दगी भी नहीं
आखिरी पल के पास
उस आखिरी एक पल में ही
विद्रूपता के साथ
पूछ ही लेता है आखिरी पल
क्या मिली तुमको भी
एक भी भरी-पूरी सॉंस

न जाने कितनी सॉसों के रेले में
हर बार दिल से छू-छू कर
तला्यता तुमको / रुका कहाँ
भागता रहा हर सॉंस / तुमसे मिलने
ओ मेरी आखिरी सॉंस!

क्या तुम्हीं हो / वह भरपूर सॉंस
सुध-बुध ले ले / इतनी मादकता
विलोप की गोपनीयता
नचिकेता की प्रथमांतिम जिज्ञासा
गुह्य ललचाते अंधकार की आत्मजा
क्या मेरे कलयुग की विड्ढकन्या हो तुम

क्या आत्मा भी भटक जाती
कितनी ही जीवन रेखाओं पर चल-चल कर
क्या आत्मा ही नहीं लेती निर्णय
त्यागने का / एक और मुखैाटा
कैैसे करती होंगी अनगिन आत्मायें
एक साथ / आखिरी पल से
मिलने का सौदा
एक ही भूगोल पर गोलबंद होकर

क्या होता है
उस आखिरी पल में
अभी तक तो
कोई नहीं आ पाया बताने
उस अंधी गुफा के भेद

अचानक लोप हो जाता
हमारे द्वारा पैदा किया हुआ कृत्रिम प्रकाश
प्राकृतिक अंधा उज़ाला
बदल जाता प्रकाशवान अंधकार में
अँधेरों में झाँकने की ताकत
कम हो गई है अब / हम सभी की
कहाँ समझ पा रहे हैं हम / अँधेरे के प्रकाश को
कहाँ भेद पा रहे हैं हम / प्रकाश के अंधकार को

अचानक लोप हो जायेगा
भाग खड़ा होगा / एक दिन सूरज
वह आखिरी दिन
उसी आखिरी पल की यात्रा
भटकाती है अंधी गुफा में
रूठ कर भागते सूरज को
निगाह में रखने की जद्दोज़हद ही ज़िन्दगी है
पता नहीं कौन-सा चरण है / इस रिले-रेस का
धावति-धावति का अधुनातन यंत्र
विधना ने रचा क्यों
हमारे युग में षड़यंत्र

कौन जाने कब गया बदल
चरैवेति-चरैवेति का वेद मंत्र
कौन जाने कब हुई पहल / थाम लिया
हाथों में धावति-धावति का
अधुनातन यंत्र

सपनों के खण्डहरों पर
ताज़पो्यी होती इतिहास की
स्मृतियों की नावों पर
महत्वाकांक्षाओं का पाल तान
घूमते हम सदियों-सदियों
देख खण्डहर अपने सपनों के
दहलते / सिर धुनते / उन बच्चों से
जिनके रेत के घरौंदो को
लात मारकर निकल जाता
एक ज्यादा बिगड़ा हुआ
कोई बड़ा बच्चा

आँसुओं का स्वाद
ताक़ीद करता उस वसीयत की
जो समुन्दर की तरह खुला है
और बहुत कुछ गोपन भी

महसूस होती है एक नई ताकत
जागती है एक नई ज़िद
सूखते नहीं आँसू
सूखते होते तो कहाँ बनता समुन्दर
आँसू ही तो बदलते हैं चट्टानों को
रेत में / और हम लगते हैं बनाने
फिर-फिर घरौंदे / रेत के

रहेंगे बनाते
जब तक साथ है हिम्मत
जब तक साथ है सागर
और सूरज भी

अशोक सिंघई


सिंघई जी का परिचय -

अशोक सिंघई , राजभाषा प्रमुख, ‘सेल’ भिलाई इस्पात संयंत्र
जन्म: 25 अगस्त, 1951, नवापारा (राजिम) जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़
पिता: सवाई सिंघई  श्री धन्ना लाल जैन
माता: स्व. श्रीमती सोमती बाई जैन
शिक्षादीक्षा: एम एस-सी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी), बी एड
सेवायें: 1973 में एम.एस-सी रसायन शास्त्र की उपाधि ग्रहण करने के तत्काल बाद मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में 1973 से 1982 शिक्षक। फरवरी 1982 में नन्दिनी खदान में सहायक शिक्षक (गणित) के रूप में पदस्थी के साथ भिलाई इस्पात संयंत्र से जुड़े। 1983 में व्याख्याता (रसायन शास्त्र) के रूप में पदोन्नत एवं खुर्सीपार उ.मा.वि.-2 में पदस्थी। 83-84 में कैम्प-1 हाईस्कूल में स्थानान्तरण। जून 1984 में प्रबंधन प्रशिक्षार्थी (प्रशासन) में चयन। प्रशिक्षण के बाद संयंत्र के जन सम्पर्क विभाग में जूनियर मैनेजर के रूप में नियुक्ति और सहायक महाप्रबंधक (जन सम्पर्क) तक प्रोन्नत हुये। 4 वर्षों तक जन सम्पर्क प्रमुख का पद सम्हालने के बाद सम्प्रति राजभाषा प्रमुख का दायित्व।  
प्रकाशन:  (1) ‘अलविदा बीसवीं सदी’ (120 पृष्ठों की प्रदीर्घ कविता)
                (2) ‘सम्भाल कर अपनी आकाशगंगा’ (काव्य संग्रह)
                (3) ‘धीरे धीरे बहती है नदी’ (काव्य संग्रह)
                (4) ‘सुन रही हो ना!’ (काव्य संग्रह)
प्रकाश्य: कवि के हाथ और संसार (काव्य संग्रह)
सम्पर्क: अशोक सिंघई, 7बी/सड़क-20/सेक्टर-5/भिलाई (छत्तीसगढ़) 490 006
दूरभाष: (0788) 2227877/2894934 (कार्यालय)
             (0788) 2228122/2898065 (निवास)
चलित दूरभाष: 099071 82061
फैक्स: (0788) 2222890/2223491

Monday, October 3, 2011

दो पाटों के बीच

बड़े काम की चीज़ है
अचार
जितना तीखा
उतना मीठा

क़िफायत
और ऐहतियात के साथ
करते हैं इसका प्रयोग
न बन सके सब्जी
या न नसीब हो
पकी हुई दाल
यही काम आता है
और वो भी
अक्सर

इसकी गंध भी
इसका स्वाद है
पुराना होता जाता है
कहते हैं बन जाता है दवा
काश मिले किसी ज़ोदड़ो की खुदाई में
अचार का कोई एक भरा मर्तबान
कसम से
अमृत बन गया होगा अब तक

हम तो निकाल डालते हैं
गड़े मुर्दों तक को
उनकी आरामगाह से बाहर
आज के समय में ज़नाब
मुर्दे भी नहीं सो सकते बेख़ौफ़

जिन्दों से मुर्दों तक और
मुर्दों से जिन्दों तक
बदल गये हैं सभी
बाज़ार के जिंस में

मूल्य के मायने
बाज़ार-भाव की व्यंजना तक
वामनावतार हो गये हैं
कब सिकुड़ जायें
कब फट पड़ने तक फैल जायें
कोई नहीं जानता

कभी वामन-विराट-वामन
बनने वाला तक नहीं जानता
इतना मायावी है फिर भी
अब बहुत नहीं डालता अपनी टांग
दूसरे के फटे में

शायद सोचता होगा वह
अपना मंदिर
अपना गुरुद्वारा
अपना चर्च, मस्ज़िद अपनी
याने अपने सारे के सारे घर
पूरी तरह सुरक्षित हैं
लिपे-पुते हैं
महकते रहते हैं
चमकते रहते हैं

गंध का रूप धारण कर
मर्तबानों से अचार
आते हैं मुख तक
याने मायावी सत्ता के पास से पास
आखिर उनको भी कुछ तो हक़ है
अच्छी जगह में कुछ साँसे लेने का

वह इतना सोचता है
वह इतना सोचने का कष्ट करता है
इसलिये दयालु है, कृपालु है
पहचान नहीं पाते उसे लोग
दरअसल नमक है वह
जैसे होता है जीवन में सुख
वह बचाता है
वह सडा़ता भी है
क्षण-क्षण गलाता भी है
भौतिक सत्ताओं को सताता भी है
किसी फ़कीर का नमक सत्याग्रह बनकर

मैं अचार से जनता तक भटकता हूँ
दरअसल गलतफ़हमी हो जाती है मुझे
अचार जनता है
या जनता अचार है
या जनता जनता है
और अचार अचार है
पर हो ही जाता है धोखा
और वो भी
अक्‍सर

लेखक

अशोक सिंघई (31) कविता संग्रह (31) समुद्र चॉंद और मैं (30) कहानी संग्रह (12) आदिम लोक जीवन (8) लोक कला व थियेटर (8) Habib Tanvir (7) उपन्‍यास (5) गजानन माधव मुक्तिबोध (5) छत्‍तीसगढ़ (5) नेमीचंद्र जैन (5) रमेश चंद्र महरोत्रा (5) रमेश चंद्र मेहरोत्रा (5) पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी (4) वेरियर एल्विन (4) व्‍यंग्‍य (4) गिरीश पंकज (3) जया जादवानी (3) विनोद कुमार शुक्‍ल (3) अजीत जोगी (2) अवधि (2) अवधी (2) गुलशेर अहमद 'शानी' (2) जमुना प्रसाद कसार (2) डॉ. परदेशीराम वर्मा (2) डॉ.परदेशीराम वर्मा (2) परितोष चक्रवर्ती (2) माधवराव सप्रे (2) मेहरून्निशा परवेज़ (2) संस्‍मरण (2) W. V. Grigson (1) अनिल किशोर सिन्‍हा (1) अपर्णा आनंद (1) आशारानी व्‍होरा (1) कैलाश बनवासी (1) चंद्रकांत देवताले (1) चम्पेश्वर गोस्वामी (1) जय प्रकाश मानस (1) डॉ. भगवतीशरण मिश्र (1) डॉ.हिमाशु द्विेदी (1) दलित विमर्श (1) देवीप्रसाद वर्मा (1) नन्दिता शर्मा (1) नन्‍दकिशोर तिवारी (1) नलिनी श्रीवास्‍तव (1) नारी (1) पं. लखनलाल मिश्र (1) मदन मोहन उपाध्‍याय (1) महावीर अग्रवाल (1) महाश्‍वेता देवी (1) रमेश गजानन मुक्तिबोध (1) रमेश नैयर (1) राकेश कुमार तिवारी (1) राजनारायण मिश्र (1) ललित सुरजन (1) विनोद वर्मा (1) विश्‍व (1) शकुन्‍तला वर्मा (1) श्‍याम सुन्‍दर दुबे (1) संजीव खुदशाह (1) संतोष कुमार शुक्‍ल (1) सतीश जायसवाल (1) सुरेश ऋतुपर्ण (1) हर्ष मन्‍दर (1)

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