Friday, November 4, 2011

विकलाँग श्रद्धा के अनुभव

तिरुमला की पहाड़ियों पर
है बालाजी का स्वर्णमंडित घर
fहंदी की सेवा में पहुँचा बालाजी के द्वार
अखिल भारतीय संगोष्ठी रखी गई थी वहाँ
ताकि अवश्य पहुँचें fहंदी-सेवी
विदेश यात्राओं से लेकर, हिल स्टेशनों, महानगरों
पर्यटन स्थलों पर आयोजन विवशता हैं
fहंदी की दिशा और दशा पर
सम्भव हो पाती हैं
ऐसी ही कुछ जगहों पर बहसें और बातें
जहाँ दिशाहीन और दुर्दशा को प्राप्त
प्रशासनिक अधिकारी एकत्र होकर
कोसते हैं, सरकार, संसद और संविधान को
दरअसल सब अब बधियाये बैल हैं
व्यवस्था में जुते, लतियाये
खुजलाते हैं एक-दूसरे की ख़ाज
मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा
इसी सिलसिले में था बालाजी में
बटोरने कुछ राष्ट्रीय पुरस्कार
उम्र के तकाजे़ में शुरू नहीं हो गया
तीर्थ यात्राओं का सिलसिला
मेरे माक्सZवादी कवि और आलोचक मित्र
न हों कृपया किसी गलतफ़हमी के आसान शिकार

तिरुपति विमानतल पर होटल तक जाने
की गई टैक्सी के चालक से शुरू हुई बातें
कहा मैंने
भाई हरि, तुम तो रहते-बसते हो तिरुपति में
तुम्हारी दिनचर्या में शामिल होगा
सानिध्य बालाजी का
धर्म की राजधानी में बसने का ईनाम
दर्शन रोज का काम

धीरे से कहा उसने
गंगा के किनारे रहने-बसने वालों के लिये
क्या कम हो जाती है गंगा की महिमा
क्या उन्हें भी नहीं होता होगा
गंगा स्नान का वही स्फुरण
वही जो कन्याकुमारी और काश्मीर से
जलपाईगुड़ी और जोधपुर से
काशी स्नान करने वालों को होता होगा

थोड़ी ख़ामोशी के बाद कहा उसने
शाम को चलिये तिरुमला
आज ही कर लीजिये दर्शन
टालिये मत कल-परसों पर
हवाई-यात्रा में क्या थकान
आज विशेष दिन है

पूछा मैंने
क्या विशेष दिन है आज
कहा उसने बड़ा सौभाग्य है आपका
गुरुवार को ही होते हैं नेत्र दर्शन
वह भी साँध्य समय
याने बिना ऋंगार के करिये दर्शन प्रभु जी के
सर्वांग दर्शन, बिना सजे-धजे
बिना सोने और फूलों से लदे
अपनी रचना मानव जैसे
सामान्य बाला जी के दर्शन

दर्शन की टिकट का टोटा पड़ गया
किसी कीमत पर
सम्भव नहीं हो रहा था प्रवेश पाना
काम आई विकलांगता, शायद पहली बार
बिना ज़ेब ढीली किये
प्राथमिकता से मैं पहुँच गया अंदर
यह जुगत बताई थी टैक्सी वाले हरिभाई ने
अच्छा सेल्स्मैन था वह तिरुपति का

लगा सोचने मैं
वे बाहर से प्रस्तर के हैं
और मैं भीतर से
मेरे भीतर का प्रस्तर लगा था पिघलने
अनुभूत कर लाखों लोगों की श्रद्धा असीम
याद आने लगे जैनेन्द्र कुमार
और उनकी रचना ‘रामकथा’

फर्श के पत्थर चिकने हो गये थे
भक्तों की चरण-रज से
याद आये बरबस
बड़े कवि विनोद कुमार शुक्ल
जिन्होंने देखे थे राजिम में
ठहर गये राजीव लोचन के
घिसे हुये पँजे पैरों के
भक्तों ने अपने सिरों से
चिकने कर दिये प्रभुओं के पाँव

कहीं नहीं लिखा था ‘छूना मना है’
भित्तियों पर उकेरी मूर्तियों पर फेरा हाथ मैंने
मिलाये वस्तुतः उन शिल्पियों से हाथ
जिन्होंने सजाया था
ईश्वर के इस घर को
अपनी बेजोड़ कला और अथक् परिश्रम के साथ
सोने के पत्तरों में छिप गये होंगे
उनके स्वेद-कण
चमकते होंगे आज भी नायाब मोतियों से
सोने के पार देखने की
जब ताब होगी मेरी आँखों में
दिख पड़ेंगी वे, अनमोल पसीनों की बूँदें

अपार जनसैलाब
जैसे समुद्र पर पछाड़ खा रही हों लहरें
सन्यासियों के लघु संस्करणों जैसे
छोटे-छोटे बच्चों के घुटे सिर
उन्हें सम्भालती माँयें
भीड़ के थपेड़ों पर बहती माँयें
उतनी ही सतर्क थीं
जैसे रक्खी हुई हों उनको
अभी भी गर्भ में

जय जयकारों के बीच
भावों के थपेड़ों पर बहता
पहुँचा मैं बिल्कुल गर्भगृह के बाहर
एक नौजवान भावों से भरपूर
जोर-जोर से हिला रहा था
अपनी बूढ़ी माँ के हाथों से
मिलाकर अपने हाथ
कितने सपने, अरमान कितने
न जाने संकल्प कितने पूरे हुये होंगे उसके

सोचता हूँ मैं
घर से तिरुपति तक कैसे लाया होगा वह
अपनी माँ को
और यहाँ भीतर गर्भगृह तक
वैसे ही जैसे कभी
माँ लाई थी उसे अपने गर्भगृह में
सँजोये कितने सपने, अरमान कितने

और फिर तिरुपति बालाजी के रचे
इस भौतिक मायावी संसार में
निहारा होगा जब उसने
अपने इस बेटे को पहली बार
और कुछ नहीं देखा होगा
अपने आसपास को

कहाँ देखा उस प्राप्त क्षणाँश में नौजवान ने
एक बार भी बालाजी को
मैं भी माया में रम गया
नहीं पाया निहार बालाजी को
क्या देखना इस प्रस्तर को
जो मुझसे भी अधिक है अचेतन
देखा मैंने
स्वयं श्रीकृष्ण ही आये थे
अपनी क्लांत, वृद्धा यशोदा को लेकर
विष्णुपति के द्वार

साक्षात दर्शन के बाद
लग गये घसिटते पैर प्रसाद की कतार में
कहा किसी ने
आपको लाइन में लगने की क्या जरूरत
अलग खिड़की की है व्यवस्था
व्यवस्था ने समझी है विकलाँगों की विवशता

मिले शुद्ध घी में सराबोर दो लड्डू
रख लिये सम्हाल कर मैंने भिलाई बिरादारी के लिये
याद आई छत्तीसगढ़ी कविता
जगन्नाथ के भात को
जगत पसारे हाथ
यहाँ भी प्रसाद में मिला
दही मिला गर्मागर्म भात
कुछ विदेशी बालायें और पुरूष
असमंज़स में थे कि क्या करें इस प्रसाद का

कहा मैंने
‘जस्ट टेस्ट इट’
उन्होंने फिराई जीभ दोने पर
और फिर मुझसे भी जल्दी
खाली कर दिया दोना

देखी साँध्य आरती पारम्परिक विन्यास में
कुछ चीज़ें हैं जो कभी नहीं बदलतीं
पूर्णिमा, अमावस, सूर्योदय-सूर्यास्त सी
याद आई
मथुरा में कभी देखी
जमुनाजी की साँध्य आरती

बाकी है बहुत कुछ अभी भी
भारतीय संस्कृति के भग्नावशेषों में
कीर्ति की विरुदावलियों के पक्ष में
समय की अदालत में साक्षी के लिये
बचा है अभी भी बहुत कुछ
मसलन तिरुपति के दरबार में पहुँचा
माँ को लेकर श्रवण
टैक्सी वाला हरिभाई

हमारी भारतीयता के ये आधार स्तम्भ
उतने ही मज़बूत, पक्के और समय-जीवी हैं
जैसे दिल्ली में अशोक की मीनार
और छत्तीसगढ़ में पक्की ईंटों से बना
ईश्वर का एक और घर
सिरपुर में अभी तक है जो
अविच्छिन्न खड़ा हुआ

बेटी की बेटी के लिये

बेटी की बेटी के
जन्म दिन पर
सोचा बाटूँ अपना सुख
अपनी कलम से

कलम साथी है
वैसे ही जैसे रहता है साथ
सुख का, दुःख का
आती-जाती श्वाँस का
जुड़ती-बिखरती साँस का

बेटी होती है किरन, भोर की
ज़िन्दगी के छाज़न से
उतरती है सुख सी
गोद में समेटने पर
लगता मानो भर लिया है
माँ को अंक में

छोटी सी दमकती
दीप-शिखा होती है बेटी की बेटी
आँगन में तुलसी के चौरे पर
पूजा घर को बिखेरते उसके नन्हे हाथ
सुगढ़ता से गढ़ने लगते
फिर-फिर मेरा छोटा सा संसार

घोसले के मुँह पर ही मिलती
हमेशा हाथ में लिये पानी का गिलास
छीनने सा पकड़ती है बस्ता-थैला
जानती है, पर मानती नहीं
उसे देखकर ही बुझ जाती है
उसके नाना की प्यास

किरन वही भोर की
बदलती जाती चपला में
हिमालय से भी
लगने लगती ऊँची / वही बेटी
जब होने लगती है ऊँची

नहीं जानते कैसा होगा
उसका घर-संसार
कैसा होगा उसका जीवन
कैसी देख-रेख

कैसी करूँ प्रार्थना अगम से
इतनी कोमल, इतनी लाड़ली है
मेरी बेटी की बेटी
नहीं डालना चाहता / मन से
उस पर आर्शीवाद तक का भार

होने न होने का प्रश्न

हे ईश्वर!
तुम तो थे / तुम हो भी / और रहोगे भी
हम भी थे / हम हैं भी / और रहेंगे भी
किस हिसाब से किसको-किसको
क्या-क्या कुछ-कुछ बटता है
तुम सर्वज्ञ / हम अल्पज्ञ
हे ईश्वर! कुछ तो समझाओ

ज़िन्दगी समतल है / ज़िन्दगी पहाड़ है
ज़िन्दगी सरल है / ज़िन्दगी गरल है
हे सरताज सुरों के / हम बहरे-गूँगों के लिये
भले भरा हो पेट गले तक
कुछ तो गाओ
हे ईश्वर! कुछ तो बहलाओ

क्यों बात-बात पर / बिना बात पर
होती है तक़रार नींद से / रात-रात भर
जब निश्चित है जनम / और मौत भी
क्यों जाते हैं लोग / बिना मौत भी
कुछ न कुछ तो दो सफाई
हे ईश्वर! सूचना अधिकारी का नाम-पता बतलाओ

बात जरा सी / साँस जरा सी
बिना हमारे / तुम आखिर हो क्या जी
अमृत पीकर तुम जी न पाये
जहर मिला / हम मर न पाये
तुम्हारी धरती पर / हम बदस्तूर सवार जी
हे ईश्वर! अब भी तुम हो क्या जी

Thursday, November 3, 2011

भाषा मनुष्य का महानतम अविष्कार

भाषा को साधना
उतना ही कठिन है
जितना पोटली में
प्रकाश को बाँधना

भाषा के तिलिस्म में
क़ैद हो गई है कविता
या कविता खुद ही तिलिस्म है
भाषा की

भाषा मिट्टी है जिसे रौंदकर
गढ़ता है कवि कुछ नया-नया
रचता नहीं कवि
मूल है मिट्टी
किसी ने नहीं बनाई आज तक
घनानन्द ने कहा है
कविता ने रचा है उसे

कविता रचने के अहम् से
कविता द्वारा रचे जाने के
विनय तक की यात्रा है
कवित्व की पहली सीढ़ी
और कविता का आधार
होती है भाषा

मिट्टी से जुड़ना
आकाश तक पहुँचने का मार्ग है
मिट्टी के ही जाये हैं
फूल और पर्वत
चक्कर लगाती है हवा
हो जाते हैं आकाश जो
वे नहीं मिल पाते मिट्टी से कभी
और आँसू बहाते हैं

ईश्वर को ईश्वर बनने के लिए
मिट्टी बनना पड़ा
मिट्टी से मिलना पड़ा
भाषा ने ही रखा है जिन्दा
ईश्वर तक को / मानव को
और तुमको भी सदी

जंगल में पेड़
चाहे हो किसी भी जाति / गुण-धर्म का
झाड़ी हो / या हो फूलों की बेल
बालियाँ हों धान की
या जीवन सी दूब
सबकी जड़ें मिट्टी में होती हैं

अलग-अलग रंगों में
अलग-अलग तासीर में
होती है संस्कृति / धर्म और भाषा
समय का गोल चक्कर है
बीस सदियों में / बीसों बार समझ कर
बरबस बिसरा दी जाती है यह बात
कि कभी विजय नहीं पाई
खून ने पसीने पर / रोशनी ने अँधेरे पर

इस सदी में उजाला
बनिस्बत कुछ ज्यादा बढ़ा
रोशनी होती है पारदर्शी
सब कुछ उघाड़ती/मूँदती/अंर्तनेत्रों को
खतरनाक अँधेरा नहीं
उज़ाला होता है
जब जाग जाता है
ईश्वर तक को बनाने वाला

पानी थमा तो / सड़ा पानी
पथ हुए पग-विहीन तो / खो गए
मिट जाती है वह संस्कृति / सभ्यता और भाषा
जो बदलती नहीं
सीखती नहीं तुमसे समय
सदा चलते रहना

बने रहने के लिए
अनिवार्य है गत्यात्मकता
तुम्हारे ही समय में सदी
कहा है एक महान् चित्रकार ने
ठहर गया धर्म / खो गया ईश्वर
सो गया राज्य / खो गया इंसान
भाषा मिट्टी है / नदी है भाषा
जो रहती है बनती
जो रहती है बहती

ईश्वर के समक्ष
पहली उद्घोषणा है भाषा
मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की
समूची स्रष्टि में
अपने श्रेष्ठ होने की

साक्षात्कार

दुर्गम गिरि शिखर
करते रहे हैं आमंत्रित
मानव-पगों को / सदियों से

स्थिर यायावर / अविचलित हिमाद्रियों पर
हरी शाल लपेटे
ऊँघते जंगल
सुनते हैं लोरियाँ कलरवों से
शीतल मंद समीर के झोंकों से
सिहरते पर्वत
भेजते रहते हैं पातियाँ / नदियों से

अपने मन के पैरों की थिरकन से
विचलित मेरा तन
धरती पर ठहरा
निहारता नीला गगन
गगन छू लेने की चाह में
टटोलता धरती की उठानों को
शुरू हो जाती चिर-वाँछित यात्रा
शोर से शान्ति की
ताकि मिले अधीर मन को
प्रतीक्षित विश्रान्ति

कछारों से / पठारों से
ऊँचे-ऊँचे देवदारों से
ओक से / मन में थमे शोक से
पूछता / कहाँ हैं पहाड़ों के पड़ाव
वादियों में घुसपैठ कर चुकीं
ऊँची-नीची सर्पीली सड़कों से
जोड़ता रिश्ते / करता बातें
अपने इस्पाती सहकर्मियों के पसीनों से सिरज़ी
रेल की पाँतों पर उड़ता
ऊँचाइयों की ओर
छूटता जाता पीछे
प्रगति का भयावह शोर

इन्हीं पहाड़ों ने कभी किया था
आकर्षित आक्रान्ता डलहौजी को
मैं भी थमता इसी ‘डलहौजी’ पर
सरकती जाती चिलमन हिमगिरियों की
और मैं लगता सिहरने
तन से / मन से भी

निहारता अनिर्मिमेष प्रकृति का भव्य सौन्दर्य
महसूसता अंतः तक प्रकृति का औदार्य
निरन्तर / शाश्वत और अप्रतिहार्य
जीवन का यह अनुभव माना अनिवार्य

दिखते पहाड़ों पर बने
छोटे-बड़े मानवीय घोंसले
और बल खाती पगडंडियाँ
जागता कसकता अपराध-बोध
साफ दिखतीं / श्रृंग-शरीरों पर
हमारे द्वारा डाली खरोचें

कुछ घटता ही है विशेष
जब मिलते हैं पुरुष और पहाड़
‘हिमगिरि’ में मिलते सज्जन
बड़े गर्व से बतलाते
सुकवि सोहनलाल द्विवेदी संग
उनने कुछ दिन थे गुजारे
‘डलहौजी’ में अवस्थित ‘टैगोर पार्क’
है खुला इश्तहार
बड़े-बड़े कवियों ने
इन गिरियों को कभी किया था नमस्कार

टूटा-फूटा तन लेकर पहुँचा यह अक्षर-किसान
पूरब-दक्षिण के पहाड़ों से
हुई कभी थी पहचान
झारखण्ड के सम्मेद शिखर की
नापी-तौली थी आध्यात्मिक उठान
सोचा मणि-महेश के श्वेत-शिखर तक जा पहुँचू
माना जाता है जो भारतीय दर्शनों का आधार
जरा जाँचँू, परखूँ
कितना ऊँचा / कितना नीचा है
हिमाचली पहाड़ों का यह परिवार

हम मनुष्य ही पाते हैं कुछ सोच
हम ही सोचते हैं ऊँचाई और निचाई
अंतर के सारे समीकरण
गढ़े हैं हमने ही
गढ़ी हैं जातियाँ ऊँची-नीची
धरा के शिखर तक धमके
धरा के गर्भ में भी जा घुसे

प्रकृति ने दीं हमें शक्तियाँ अपार
सौंप दिया नियन्ता ने
अपना समूचा कारोबार
समय और प्रकृति के द्वन्द्व में
हम हुये थे तैनात रक्षक की तरह
हमने किया व्यवहार अब तक
भक्षक की तरह

पहाड़ों के सामने आते ही
खटकने लगता है अपना बौनापन
नदियों के पास जाते ही
बिखरने लगता है
मनुष्य होने का अपना अहम्
रावी का शीतल जल
और कलकल नाद
जतला देता / कितना फीका है
मानवीय संगीत का नाद और आह्लाद

सरल नहीं होतीं यात्रायें
नदियों की / पहाड़ों की
हमारे अंदर भी होता है वही संसार
जो होता है सामने आँखों के
दिखता है हमें साफ-साफ
हमारे अंतस् में भी
बहती हैं नदियाँ
हमारे अंतस् में घर बनाकर
जमे रहते हैं पहाड़
अंदर भी बहती हैं हवायें
झूमते हैं वृक्ष
खिलते रहते हैं फूल
सुन सको तो
अंदर भी गूँजता है कलकल नाद
फुदकती हैं गिलहरियाँ
नाचती हैं चिड़ियाँ
अंदर की यात्रा होती है और भी कठिन
पहले तो दुष्कर होता है
अंतस् में प्रवेश कर पाना

नदियाँ बहती हैं
नहीं जानतीं / देश/प्रान्त की सीमायें
नहीं मानतीं / वर्ण/वर्ग-भेद की बाधायें
सबके लिये खुला है उनका आँचल
सबके लिये जगह / जैसे गोद जननी की
पर्वत भी विचरने देते / अपने पर / सबको
सबके लिये जगह / जैसे छाती पिता की

कोई दरबारी राग नहीं
कोई समय की बात नहीं
श्रृंगार किया है रंग-बिरंगे फूलों से
अपूर्व गंध लिये / सर्वदा / सबके लिये
हवायें दिखतीं गीत गातीं

रावी के प्रबल वेग से
हो जातीं गोल-मटोल चट्टानें
मानों पर्वत और नदी के प्रणय-प्रसंग से
पैदा होतीं शिवfलंग सी संतानें
पहाड़ तराशे जाते
समय और नदी के प्रयास से
और उतरते नीचे / मानों पतन-गर्त में
शिखर चूर-चूर हो जाते
बालू में बदलते जाते

शायद इन्हीं से सीखा हमने
माँ के दूध को डिब्बों में सजाना
वहीं के वहीं हैं
पर्वत, पेड़ और नदियाँ
सदियों में बदला है
तो सिर्फ हमारा जमाना

इन्हीं बालूओं से हम बनाते
अपने अपनों की सपनों की दुनिया
संस्कृति और सभ्यताओं की अट्टालिकायें गगनचुम्बी
गगन चूमने का गर्व तिरोहित हो जाता
अपने रचने की प्रतिभा का दर्प पिघल जाता
देखकर पिघलते हिमगिरियों को
fनःस्वार्थ बहती नदियों को
निरख कर / समाधिस्थ वृक्षों को
सुन कर गाते पँछियों को
देख कर थिरकती गिलहरियों को

सारा जोड़-घटाना लगने लगता व्यर्थ
बिना पहाड़ के / नदियों के / पँछियों के बिना
क्या है धरती पर जीवन का
और किसी के भी जीने का कोई अर्थ

हुआ परिचय पहाड़ों से
परिचय से ही जनमता और फिर बढ़ता है प्यार
अपरिचय से बना रहता है अज्ञात भय
परिचित होने तक
जानने और मानने पर ही
प्रतिमा बन जाती है पूज्य
कितने-कितने रूपों में विराजित हैं
देवियाँ पहाड़ों पर
शक्तिस्वरूपायें ठहरी हैं
अपने-अपने ठिकानों पर

माँ तक जाना
इतना हुआ कठिन कब से
सम्भवतः तब से
बड़े, और बड़े होने लगते हैं
हम जब से

चम्बा की देवी से मैंने इतना ही माँगा
मुझे आस्था नहीं / ज्ञान दो
मुझे मुक्ति नहीं / संघर्ष की शक्ति दो
मुझे आशीष नहीं / अपने होने की स्वीकृति दो

यदि दे सकती हो
और चाहती हो सचमुच कुछ देना
मुझे दो पंचतत्वों की वही मूल शक्ति
जो पहाड़ों ने पाई है
जो नदियों में समाई है
जो ज्वालामुखियों में छिपाई है
जो हवाओं में बहाई है
दो वही मूल शक्ति
जो नभ की तरूणाई है

नहीं है कामना अमरता की
जानता हूँ कहानी त्रिशंकु की
मैं नहीं चाहता ठहरना वैसे ही
जैसे पहाड़ पर ज्यादह नहीं ठहरता प्रकाश
पसरता है अंधकार
सब कुछ काला करता हुआ
आगत लालिमा के लिये
उपयुक्त पृष्ठभूमि बनाता
कितना भयावह होता है अँधकार
दिखने लगता है सब कुछ साफ-साफ
प्रकाश की ही नहीं
अँधकार की भी होती है एक भूमिका
बिल्कुल ऐसा ही होता है जीवन का चक्र

समझ में आने लगता है
कितना जटिल है जीवन का जंजाल
जब फटी स्वेटर पहन कर
हिमगिरियों में मिल जाता है
देश का एक कोई नौनिहाल
बेचता मुझे तरह-तरह की शाॅल
नीचे की दुनिया नहीं सिखा पाती दुनियादारी
पहाड़ पर कब पनपा व्यापार
पहाड़ पर कब रुका अर्थ का रथ

अविचलित स्थिर पहाड़
जब भसकते हैं / भीतर की तड़फन से
सब कुछ हो जाता है पहाड़ ही पहाड़
कभी नहीं दहाड़ता पहाड़
पहले कभी नहीं करता है वार
हम उसे जानें या न जानें
वह हमें जानता है

सबसे ऊँचा और
ईश्वर के सबसे निकट होता है पहाड़
इसीलिये अपने कई रूपों में
जमा है ईश्वर वहाँ
जिसको भी जाना होता है
किसी अनाम/अज्ञात सत्ता के पास
उसे अंततः चढ़ना ही पड़ता है पहाड़

Wednesday, November 2, 2011

प्रकृति विलगा

थोड़े बड़े मकान की लोभ मैं
अपना थोड़ा छोटा सरकारी क्वार्टर
बदल लिया मैंने
छूट जाता है बहुत सा अतीत
वर्तमान की दौड़ में भविष्य के दॉंव में
भविष्य की चाह में
ऑंगन में फलता अनार रह गया पीछे
कीड़े खा जाते थे फल
हम तोड़ नहीं पाते थे
कुछ लगाव सा था उस अनार के पेड़ से
छूट गये काफी लम्बे और लगभग घर की पहचान बन चुके
ऊंचे पूरे युक्तिगत और सदाबहार ‘अशोक’
अशोक छूट गया पीछे
बहुत लिपटीं बेंतें गुलाब की
बोगन बेलिया और चमेली
मधुकामिनी और रातरानी
कुछ ज्यादा ही खिलने से लगे थे
रोकना चाहते थे सब
विदा किया सबने
मौन शुभकामनाओं की गंध दान कर
नये घर में भी बड़े-बूढ़े से आम
नीम और जामुन मिले
चला था बुद्ध बनने
बन कर सिद्धा थे लौट गया वापिस
कविता के पास
सुनहरे भविष्य को ठीक से पालने
कोई पेड़ काटे
मुझे लगता है
यह सटीक
प्रमाण है मेरी हत्या का
मेरे परिवार
समाज
और देश की हत्या
लगता जैसे पृथ्वी को कुतरने लगा है कोई
काटने लगा है जीवन की जड़
पेड़ काट कर
कुछ काटने भी पड़ते हैं
जिनका काटा जाना एक जरूरी
संघर्ष की तरह
लाजिमी है शायद
गलती से कर्मइहॉं
ने काट दिया एक अचीन्हा
न फल
न फूल मेरे लिये
अपरिचित पेड़
एक उड़िया सयाना
ठीक उसी तरह
नमूद हुआ मेरे सामने
जैसे कि शोक में बैठने
आया मेरे घर
यह बताने कि एक बूढ़े पेड़ की
तरह वह है अभी भी
मैं छोटा न करूं दिल
कहा उसने
बाबू औषधि का पेड़ था यह
हवा को शुद्ध करने वाला
सबसे कारगर सयाना
इसका औषधिक उपयोग
जानने वाला जाने
औषधियों का परिवार में
बड़ा मान है इस पेड़ का
मेरा दुःख दुगना हो गया
काटा जा रहा है वो
जिसका अतिशय जरूरी है रहना
बने रहना
चार-पॉंच सदियों जैसा तना बाकी था
सयाने उड़िया के साथ
मैने उसे अपनी चिन्ताओं व
प्राथमिकताओं की निगरानी में ले लिया
बड़ी जतन हुई
उसका किया गया ईलाज
आश्चर्य तने से फूटे पॉंच बाहू
आपस में एक दूसरे की तरफ मानों जैसे मूँह किये हों
अशोक चक्र के शेर आग में अशोक की
अपनी एक प्रिया मित्र के कहा मैने
जानती हो
एक तोता लाया हूँ मैं
बिल्कुल सीधा बैठा रहता है
उन पॉंच बाहुओं के बीच
हमारी कल्पना में जैसा बैठा हो
कुछ हमारी चाहत का संसार
हमारी सोची दुनिया
दुनिया जैसी दुनिया उसने कहा
एक बात कहूँ
बुरा तो नहीं मानोगे
उसे बांध कर मत रखना
मुझे सचमुच बुरा लगा
कहा मैंने हम बंधनों के खिलाफ ही खड़े हैं
हम पंछी को क्या बॉंधेगे
वह कला है
किसी फुटपाथ पर मेहनत से
ढालता है तोता
मिट्टी से लगता है रंग प्रकृति से चुन चुन कर
ऊपर वाले के तोते से
ज्यादा जीता है नीचे वाले का तोता
पर सुरक्षित बने रहने की बड़ी कठिन शर्तें हैं
पंछी हो पर
पर नहीं फड़फड़ाना
जब हम देखें
एक सी मुद्रा में अटेन्शन नजर आओ पंछी हो
पर मुंडी नहीं हिला सकते
ऑंखें नहीं मटका सकते
अपने प्रेम का ककहरा
नहीं गुनगुना सकते
इतना रोया आसमान
धुल गया तोता
पॉंच बाहुओं के बीच संरक्षित
किले में सजा हुआ
fसंहासन पर राजसी मुद्रा में बैठा हुआ
बदरंग हो गई उसकी पहचान
गरीबों की कलाओं पर
गरीबों की मल्कियतों पर
अक्सर बरस जाता है जब देखो तब आसमान
मैं ओलों की मृत देह
जब बरस रही थी
जाकर उठा लाया तोते को
ले लिया कलम की सुरक्षा में तलाश है
फुर्सत की
उस कलाकर की
जिना कच्चा पर
पक्का ठिकाना मालूम है मुझे
हमेशा किसी फुटपाथ पर
जहॉं खूब फिरती है जनता
रकम-रकम की जैसे ही मिलेंगे
कलम और रंग तैरेंगे श्रम के सरोवर में
गोद भर जायेगी फिर
उन पॉंच बाहुओं वाले शिशु सयाने पेड़ की ।

लूले पत्थर

जिन्दगी भर
जिन्दगी के पैरों तले ही
रहता है पत्थर

जिन्दगी पत्थर में
भरती रहती है
भरपूर जिन्दगी
जिन्दगी भर

पत्थर पड़ जाने के बाद
नहीं रह जाती जिन्दगी, जिन्दगी
कहते हैं पत्थर के नीचे
कुलबुलाती रहती है
ताजिन्दगी जिन्दगी

सुना है,
बावक्त कयामत
उठेगी जिन्दगी
रूबरु होनेे उसके
जो कभी रूबरु नहीं हुआ
किसी के

सोचता हूँ मैं
कयामत के वक्त
कहाँ होगा पत्थर
जिन्दगी के नीचेे या
जिन्दगी के ऊपर

पत्थरों को तराशने वालों ने
नहीं सोचा कभी
पत्थरों के बारे में
पत्थरों की पनाह में
जागती-सोती
जिन्दगियों के बारे में

पत्थरों को जिन्दगी के साथ
कायनात बख्शने वाले ने भी
कहाँ सोचा
कहाँ होंगे पत्थर
कयामत के वक्त
ता-कयामत जिन्होंने
उठाई है जिम्मेदारी
जिन्दगी और मुर्दानगी में
फर्क जताने की
जिन्दगी को जिलाने की
मौत को दबाने की

कयामत के दिन पूछेगा पत्थर
पकड़ कर दामन, खुदा से
बता कयामत के बाद
मेरी जगह है कहाँ?
अगर हाथ होते तो पत्थर
तार-तार कर देता गरेबाँ
कयामत के दिन
जिन्दगी, मौत और खुद को
बनाने वाले का
स्वयं को कहीं रूपोश रख
दुनिया को चलाने वाले का

Tuesday, November 1, 2011

मित्र

मित्र
होता है एक अहसास
ऐसी सुरक्षा जो पुरसकून है
और आरामदेह भी

मित्र
होता है एक निर्बन्ध सम्वाद
नहीं करनी पड़ती शब्दों की बुनावट
बातों की स्वाभाविक बरसात

मित्र
होता है आईना
जिसके सामने कभी नहीं शर्माता कोई
और न ही बनानी पड़ती हैं
सोच / समझ की मुद्रायें
होता है नि:संकोच सजना-सँवरना

मित्र
होता है कड़ी धूप में ठंडी छाँव
अपरिचय के सागर में डूबते की सोच में
परिचय का गाँव

मित्र
होता है अज्ञात के कौतुक समन्दर में
साथ-साथ डूबने-उतराने वाला
अपने ही अनुभवों और ज्ञान की बैक-फाईल

मित्र
होता है मरण भी
कर देता अलग सबसे
वैसे जीने के लिये
बहुत कुछ सिखा सकता है मरना

मित्र
अफसोस! मरने के बाद
कहाँ हो पाता है जीना
मित्र के छूट जाने पर
मित्र के रूठ जाने पर
सिकुड़ जाता है
बड़े-बड़े हौसलों का सीना

दूध का कर्ज

अपनी जान से बढ़कर चाहते हैं
जिन्हें हम
हमारी औलादें
अपनी शिक्षा में बड़ी नफ़ासत के साथ
हम लादते जाते हैं
उन पर फर्ज-दर-फर्ज

अपने ही अंशों तक से व्यापार
मुहावरे गढ़ डाले
खोल डाला दूध तक का खाता
मांढ़ दिया औलादों पर
दूध का कर्ज

परवान चढ़ाते हैं
मजबूत करते हैं उनके पर
दिखाते हैं आसमान
दिखाते हैं सितारे
कहते हैं, दमको चाँद-तारों की तरह
पर बाँधकर रखना चाहते हैं
उनके पैरों को
अपने घोंसलों के तिनकों से

बांधकर नैतिकताओं और परम्पराओं -
के ढकोसलों से सजी अदृश्य जंजीरों से
मांगने लगते हैं ब्याज समेत
अपनी एक-एक थपकी का खर्च

वैसे अपनी बची-खुची जिन्दगी
रेहन रख दी होती है हमने
आशाओं की अदायगी में
अपने सपनों की तिज़ारत में
नीलाम कर देते है हम
ममता के विरल/तरल अहसास को

मौत की यकीनी
तल्ख़ करने लगती है
fजंदगी के जाम की
चंद बचीं घूँटें
व्यर्थ लगने लगता है
सारा हिसाब-किताब

दरअसल व्यर्थ है हमारी आशायें
लादल हैं हमारे सपने
प्रायोजित है हमारी शिक्षा
षड़यंत्र है जीवन की ऐसी व्यवस्था

दुनिया धड़ाके से नहीं बदलती
गाते रहो / लिखते रहो
बकते रहो । सिकते रहो
हाँक पाड़ते-पाड़ते
मेरी तो गूँगी पड़ने लगी है जुबान
दुनिया फिर भी नहीं सम्हलती
फिर भी जारी रखूँगा
भंगिमाओं से ही देता रहूँगा बयान

एक दिन आयेगा
जब सूरज के उगने पर
बगावत करके
सिकुड़ने के लिये
कमल खिलने से
कर देंगे इंकार

उस दिन की नज़र उतारने
वैसे मेरे पास तो नहीं है कोई खाता
यदि कुछ दर्ज हो कहीं
किसी और के खाते में
तो आज मैं
अपने बच्चों के सारे कर्ज
मुआफ करता हूँ
गुजरे जमानों की गर्द झाड़ कर
लेन-देन का गंधाता
सदियों पुराना
रिश्तों वाला बस्ता साफ करता हूँ

हवा महलों के आधार

रात आधी
नींद आधी
जागती थी चेतना
चेतना का मन
आधा भरा
छलका आधा

चेतना की तंद्रा को
झटका सा लगा था
बिजली का
बिजली की अचानक
गैरमौजूदगी से
आधी खुली खिड़कियों से
आती थी
आधी तेज
आधी धीमी
आधी हवा

कुछ बरसा पानी
आधा भारी
आधा धीमा
बिजलियों के नन्हें बच्चे भी
चक्कर काट रहे थे
बादलों की
अंगुलियाँ पकड़
आसमान के पार्क में

आधा लेटा
याने अध-लेटा
आधा उठा
बैठा आधा
दिखा पैड आधा
और बिना कैप की
पेन आधी

पाँच हजार वर्षों की
सभ्यता का
मुझे धुँधला सा
पता है
वह भी
सुनी-सुनाई
सूचनाओं के बतौर
वह भी
मात्र आधी अवधि का

बहुत सी
स्टाम्प-पेपरों पर
टँक कर जैसे
चीजें बन जाती हैं सत्य
और
कानूनन सत्य भी
हमारे बहुत से ज्ञात
ऐतिहासिक सत्य
ऐसे ही
स्टाम्प-पेपरों पर दर्ज
सत्ताओं के फ़रमान हैं
आस्थाओं के
हवामहलों पर लहराते
आसमानों के
निशान हैं

अलबत्ता अधकचरा है
अब तक बटोरा सहेजा ज्ञान
यूँ तो कचरे से
बिजली बनाने की बात
लिखी-पढ़ी जा रही है

वैसे कचरा भी
सही ढंग का हो
तो कुछ न कुछ
काम आता है

मनुष्य रूपी कचरे पर
मक्खियाँ नहीं भिनभिनातीं
मच्छर भुनभुनाते हैं
मच्छरों को मारना
या हमारी क्रियाओं से
उनका दुर्घटनावश मर जाना
fहंसा है

हमारा पक्ष होता है कि
हम मच्छरों को मारने
उनके पास नहीं जाते
अलबत्ता वो ही पास आते हैं
इसीलिये बेचारे
मारे जाते हैं
यह देह देश को बचाने जैसा
पुनीत कार्य है

यह fहंसा को सत्य और
कर्म-जन्य सत्य
करार देने का
पारम्परिक और विधिक आधार है

तभी बात कौंधी
बिजली जाती है तो
अँधेरों के जीवधारी अंश
लपकते हैं
मनुष्य-देह की ओर
आखिर हम
ईश्वर तक के साँचे हैं
अँधेरों के जीवधारी अंशों का
आसुरी संहार fहंसा नहीं
धर्म युद्ध है

यह हिंसा को सत्य और
मूल्यगत सत्य
करार देने का
धार्मिक आधार है

चौका मैं
मुझे कुछ ज्यादा ही
काटते हैं मच्छर
मेरी देह से फूटता है
क्या कोई
प्रकाश ज्यादा
जिसके अंधःगर्त के
अंदर का अंधकार
करता है आकर्षित
अपने जीन-सम्बन्धियों को
परम्परा से,
विष पीते-उगलते
जीवित अँधेरों को

आवाज उठाते ही
घोंट दिये जाते हैं गले
सारी दुनिया जो
अकेले ही हड़पनी है हमें
किसी को नहीं
कोई बँटवारा

हिंसा को सत्य
और आवश्यक सत्य
बताने का यह
दार्शनिक आधार है

हिंसा इसीलिये बची है
क्योंकि
जितनी बड़ी होती है fहंसा
उससे बड़े ढाल होते हैं
पास हिंसा के
धार्मिक, पारम्परिक, विधिक
और दार्शनिक आधारों के

अँधेरों को
प्रकाश की मार से
बचने के लिये
प्रकाश की ही
ओट मिलती है

प्रकाश की ही
ओट मिलती है
अँधेरों को
छिपने के लिये

आधा अँधेरा
आधा उजाला
आधे दिखते
आधे छिपते
आधे-आधे
अँधेरों-उजालों के
आधे-अधूरे
दलालों को
झाड़ कर सारे
गर्द-जाले
पूरे उजाले में
सारी दुनिया के
सामने लाना है

फिर से
सारी दुनिया के लिये
सूरज को एक सा
सबका, और सबके लिये
बनाना है
हवामहलों की धुँध
तिरोहित करने
एक पूरा का पूरा
नया से नया
सूरज उगाना है

लेखक

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