Saturday, February 7, 2015

सुन रही हो ना!? : अशोक सिंघई


अशोक सिंघई  की कविताओं के बारे में बात करना, सोचना और फिर कुछ शब्दबद्ध करना कुछ ऐसा लगता है जैसे अगम समय के आर-पार, भूगोल के अन्दर और बाहर तथा सुनी-देखी और पढ़ी स्मृतियों¬ के एक ऐसे परिदृश्य की खिड़की खोलना है, जिससे साफ-साफ दिखता तो बहुत कम है पर एक आदिम गंध और जीवनदायिनी हवा के झोंके, पहले प्राणी तक के पदचाप हम तक आने लगते ह®। सचमुच एक लम्बी यात्रा कर ली है उन्होंनेे।
‘सुन रही हो ना!?’ अशोक सिंघई  का चौथा काव्य संकलन है जिसमें उनकी वे रचनायें संकलित हैं जो उन्होंने काव्य साधना के नैरंतर्य में अलग-अलग समयों पर लिखी हैं। ‘अलविदा बीसवीं सदी’, ‘सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा’ और ‘धीरे धीरे बहती है नदी’ उनके पूर्व संग्रह हैं। इन संग्रहों के प्रकाशन काल व क्रम से उनमें संग्रहित कविताओं की क्रमबद्धता का कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रकाशन की अपनी पसंदगी के लिहाज़ से अशोक ने अपनी कविताओं को अलग-अलग घर दिये हैं। 
अपनी कविताई में अशोक सिंघई  स्वच्छंद हैं। नई कविता के फ्रेम में वे नहीं बँधते और न ही गीत-अगीत के चक्करों से उनका कोई नाता है। अपनी प्रदीर्घ कविता ‘अलविदा बीसवीं सदी’ से वे आभासित हुये पर ‘धीरे धीरे बहती है नदी’ में उनकी छोटे कलेवर में बड़ी रचनायें दिखती हैं। ‘सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा’ दीर्घ और वैचारिक कविताओं का संग्रह है। अपनी ही कविताओं से अगले स्वरूप में वे बहुत अलग खड़े दिखते हैं।
‘सुन रही हो ना!?’ में रोमानी कवितायें हैं, अधिकांशतः। प्रेम मनुष्य का केन्द्रीय अनुभव है। जायसी ने प्रेम को जीवन का नमक कहा है। मनुष्य स्वयं से सबसे अधिक प्रेम करता है। इसीलिये अपने प्रेम में वह स्वयं को आरोपित कर लेता है। यहीं से प्रेम में आध्यात्म का उन्मेष होने लगता है या पाठक अथवा श्रोता प्रेम में अपने प्रेम पात्रों का आरोहण या प्रतिरोपण करने लगते हैं। अपने रोज़-बरोज़ की ज़िन्दगी में अपने परिवेश और अपनी भावनाओं को साथ लेकर जीने का प्रयास प्रेम के रूप में प्रकट होता है जिसका अधूरापन ही सत्य का शायद एक स्वरूप है। प्रेम में निरन्तरता और नýरता दोनों होते हैं। कवि ने लिखा है कि, ‘प्रेम तो है चाँद/या फिर जल नदी का/या तो बढ़ता रहता है/ या फिर घटता रहता है।’ 
प्रेम के प्रिय पात्रों में प्रकृति होती है और मनुष्य भी। अपने प्रिय पात्र को स्वतंत्र कर पाना प्रेम की सबसे बड़ी कसौटी है। कवि का तादात्मय प्रेम के रूप में मुखरित होता मौन है जो जुड़ाव की जिजिविषा से मोहाक्रान्त मालूम होता है। इस प्रेम में मुक्ति की भी दलीलें हैं। प्रेम में केवल राग ही नहीं, विराग भी होता है। वैसे तो हर सार्थक कविता प्रेम कविता होती है पर एक सार्थक प्रेम कविता बहुत मुश्किल से लिखी जा पाती है। कवि ने तो प्रेम कविताओं एक संग्रह ही सुधि पाठकों के सामने रखा है। इसका पाठ प्रेम की उदात्त भावना की मांग करता है। देखना यह है कि अब वे अपनी कवितायें किस कलेवर में सामने लाते हैं। उम्मीद है कि इस संग्रह की उनकी रचनायें पसंद की जावेंगी और पाठकों को अपने-अपने प्रेम की स्मृतियों को फिर से छूने और सहलाने का मन होगा।


2 comments:

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