Tuesday, November 1, 2011

मित्र

मित्र
होता है एक अहसास
ऐसी सुरक्षा जो पुरसकून है
और आरामदेह भी

मित्र
होता है एक निर्बन्ध सम्वाद
नहीं करनी पड़ती शब्दों की बुनावट
बातों की स्वाभाविक बरसात

मित्र
होता है आईना
जिसके सामने कभी नहीं शर्माता कोई
और न ही बनानी पड़ती हैं
सोच / समझ की मुद्रायें
होता है नि:संकोच सजना-सँवरना

मित्र
होता है कड़ी धूप में ठंडी छाँव
अपरिचय के सागर में डूबते की सोच में
परिचय का गाँव

मित्र
होता है अज्ञात के कौतुक समन्दर में
साथ-साथ डूबने-उतराने वाला
अपने ही अनुभवों और ज्ञान की बैक-फाईल

मित्र
होता है मरण भी
कर देता अलग सबसे
वैसे जीने के लिये
बहुत कुछ सिखा सकता है मरना

मित्र
अफसोस! मरने के बाद
कहाँ हो पाता है जीना
मित्र के छूट जाने पर
मित्र के रूठ जाने पर
सिकुड़ जाता है
बड़े-बड़े हौसलों का सीना

दूध का कर्ज

अपनी जान से बढ़कर चाहते हैं
जिन्हें हम
हमारी औलादें
अपनी शिक्षा में बड़ी नफ़ासत के साथ
हम लादते जाते हैं
उन पर फर्ज-दर-फर्ज

अपने ही अंशों तक से व्यापार
मुहावरे गढ़ डाले
खोल डाला दूध तक का खाता
मांढ़ दिया औलादों पर
दूध का कर्ज

परवान चढ़ाते हैं
मजबूत करते हैं उनके पर
दिखाते हैं आसमान
दिखाते हैं सितारे
कहते हैं, दमको चाँद-तारों की तरह
पर बाँधकर रखना चाहते हैं
उनके पैरों को
अपने घोंसलों के तिनकों से

बांधकर नैतिकताओं और परम्पराओं -
के ढकोसलों से सजी अदृश्य जंजीरों से
मांगने लगते हैं ब्याज समेत
अपनी एक-एक थपकी का खर्च

वैसे अपनी बची-खुची जिन्दगी
रेहन रख दी होती है हमने
आशाओं की अदायगी में
अपने सपनों की तिज़ारत में
नीलाम कर देते है हम
ममता के विरल/तरल अहसास को

मौत की यकीनी
तल्ख़ करने लगती है
fजंदगी के जाम की
चंद बचीं घूँटें
व्यर्थ लगने लगता है
सारा हिसाब-किताब

दरअसल व्यर्थ है हमारी आशायें
लादल हैं हमारे सपने
प्रायोजित है हमारी शिक्षा
षड़यंत्र है जीवन की ऐसी व्यवस्था

दुनिया धड़ाके से नहीं बदलती
गाते रहो / लिखते रहो
बकते रहो । सिकते रहो
हाँक पाड़ते-पाड़ते
मेरी तो गूँगी पड़ने लगी है जुबान
दुनिया फिर भी नहीं सम्हलती
फिर भी जारी रखूँगा
भंगिमाओं से ही देता रहूँगा बयान

एक दिन आयेगा
जब सूरज के उगने पर
बगावत करके
सिकुड़ने के लिये
कमल खिलने से
कर देंगे इंकार

उस दिन की नज़र उतारने
वैसे मेरे पास तो नहीं है कोई खाता
यदि कुछ दर्ज हो कहीं
किसी और के खाते में
तो आज मैं
अपने बच्चों के सारे कर्ज
मुआफ करता हूँ
गुजरे जमानों की गर्द झाड़ कर
लेन-देन का गंधाता
सदियों पुराना
रिश्तों वाला बस्ता साफ करता हूँ

हवा महलों के आधार

रात आधी
नींद आधी
जागती थी चेतना
चेतना का मन
आधा भरा
छलका आधा

चेतना की तंद्रा को
झटका सा लगा था
बिजली का
बिजली की अचानक
गैरमौजूदगी से
आधी खुली खिड़कियों से
आती थी
आधी तेज
आधी धीमी
आधी हवा

कुछ बरसा पानी
आधा भारी
आधा धीमा
बिजलियों के नन्हें बच्चे भी
चक्कर काट रहे थे
बादलों की
अंगुलियाँ पकड़
आसमान के पार्क में

आधा लेटा
याने अध-लेटा
आधा उठा
बैठा आधा
दिखा पैड आधा
और बिना कैप की
पेन आधी

पाँच हजार वर्षों की
सभ्यता का
मुझे धुँधला सा
पता है
वह भी
सुनी-सुनाई
सूचनाओं के बतौर
वह भी
मात्र आधी अवधि का

बहुत सी
स्टाम्प-पेपरों पर
टँक कर जैसे
चीजें बन जाती हैं सत्य
और
कानूनन सत्य भी
हमारे बहुत से ज्ञात
ऐतिहासिक सत्य
ऐसे ही
स्टाम्प-पेपरों पर दर्ज
सत्ताओं के फ़रमान हैं
आस्थाओं के
हवामहलों पर लहराते
आसमानों के
निशान हैं

अलबत्ता अधकचरा है
अब तक बटोरा सहेजा ज्ञान
यूँ तो कचरे से
बिजली बनाने की बात
लिखी-पढ़ी जा रही है

वैसे कचरा भी
सही ढंग का हो
तो कुछ न कुछ
काम आता है

मनुष्य रूपी कचरे पर
मक्खियाँ नहीं भिनभिनातीं
मच्छर भुनभुनाते हैं
मच्छरों को मारना
या हमारी क्रियाओं से
उनका दुर्घटनावश मर जाना
fहंसा है

हमारा पक्ष होता है कि
हम मच्छरों को मारने
उनके पास नहीं जाते
अलबत्ता वो ही पास आते हैं
इसीलिये बेचारे
मारे जाते हैं
यह देह देश को बचाने जैसा
पुनीत कार्य है

यह fहंसा को सत्य और
कर्म-जन्य सत्य
करार देने का
पारम्परिक और विधिक आधार है

तभी बात कौंधी
बिजली जाती है तो
अँधेरों के जीवधारी अंश
लपकते हैं
मनुष्य-देह की ओर
आखिर हम
ईश्वर तक के साँचे हैं
अँधेरों के जीवधारी अंशों का
आसुरी संहार fहंसा नहीं
धर्म युद्ध है

यह हिंसा को सत्य और
मूल्यगत सत्य
करार देने का
धार्मिक आधार है

चौका मैं
मुझे कुछ ज्यादा ही
काटते हैं मच्छर
मेरी देह से फूटता है
क्या कोई
प्रकाश ज्यादा
जिसके अंधःगर्त के
अंदर का अंधकार
करता है आकर्षित
अपने जीन-सम्बन्धियों को
परम्परा से,
विष पीते-उगलते
जीवित अँधेरों को

आवाज उठाते ही
घोंट दिये जाते हैं गले
सारी दुनिया जो
अकेले ही हड़पनी है हमें
किसी को नहीं
कोई बँटवारा

हिंसा को सत्य
और आवश्यक सत्य
बताने का यह
दार्शनिक आधार है

हिंसा इसीलिये बची है
क्योंकि
जितनी बड़ी होती है fहंसा
उससे बड़े ढाल होते हैं
पास हिंसा के
धार्मिक, पारम्परिक, विधिक
और दार्शनिक आधारों के

अँधेरों को
प्रकाश की मार से
बचने के लिये
प्रकाश की ही
ओट मिलती है

प्रकाश की ही
ओट मिलती है
अँधेरों को
छिपने के लिये

आधा अँधेरा
आधा उजाला
आधे दिखते
आधे छिपते
आधे-आधे
अँधेरों-उजालों के
आधे-अधूरे
दलालों को
झाड़ कर सारे
गर्द-जाले
पूरे उजाले में
सारी दुनिया के
सामने लाना है

फिर से
सारी दुनिया के लिये
सूरज को एक सा
सबका, और सबके लिये
बनाना है
हवामहलों की धुँध
तिरोहित करने
एक पूरा का पूरा
नया से नया
सूरज उगाना है

लेखक

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