Saturday, February 7, 2015

मेरा छत्‍तीसगढ़ : डॉ.परदेशीराम वर्मा



मेरा छत्‍तीसगढ़ : डॉ.परदेशीराम वर्मा 

छत्‍तीसगढ़ के संबंध में डॉ.परदेशीराम वर्मा के द्वारा लिखे गए लेखों का संग्रह.

लेखक के दो शब्द
छत्तीसगढ़ राज्य का यह पहला दशक उपलब्धियों भरा सिद्ध हुआ। यद्यपि कई मामलों में चौंकाने वाली कमजोरियों भी सामने आ गई। लेकिन कुल मिलाकर हमारा नया राज्य आशा जमाने वाला विश्वनीय छत्तीसगढ़ बनकर उभरा। धान का कटोरा तो यह पहले ही कहा जाता था। अब इसे भू-संपदाओं का चमत्कारिक कटोरा भी कहा जाता है। यहां औद्योगिक विकास की आंधी भी चल रही है। गांवों में कारखाने जा चुके हैं। किसान अपनी जमीन बेचकर नये मालिकों की मजदूरी करने लगे हैं। प्रेमचंद का अमर उपन्यास ‘गोदान’ पहचहत्तर वर्ष पूर्व लिखा गया। उसमें एक खाते पीते किसान होरी की दारुण कथा है। होरी किसान से मजदूर बन जाता है। छत्तीसगढ़ का किसान धीरे-धीरे मजदूर बन रहा है। उदार मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ के गरीब ग्रामीणों के लिए चावल देकर कीर्तिमान रच दिया है। वे हर दिशा में आशाजनक पहल भी कर रहे हैं। मगर समस्यायें हैं कि उन पर काबू पाना लगभग असम्भव सा जान पडऩे लगा है। नक्सल समस्या उन्हीं लाइलाज सी लगने वाली बीमारियों में से एक है। 
छत्तीसगढ़ लडऩे की कला नहीं जानता। वह शांति का पक्षधर है। छत्तीसगढ़ में जातिय वैमनस्य का रंग कभी गाढ़ा न हो सका। मेलजोल के लिए विख्यात छत्तीसगढ़ ने सदैव मेहमानों को गले लगाकर अपना बनाया। छत्तीसगढ़ को अन्य प्रांतों से आये सपूतों ने भी खूब समृद्ध किया। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में ऐतिहासिक योगदान देकर सबने इसकी महिमा को विस्तार किया। 
छत्तीसगढ़ के पेण्ड्रा में बैठकर पं. माधवराव सप्रे जी ने हिन्दी की पहली कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टïी’ का सृजन किया। 
स्थानीय हितों की अनदेखी होने पर छत्तीसगढ़ का आहत स्वाभिमान भी जागता है। मगर अन्य प्रांतों की तरह उसका स्वरूप उग्र नहीं होता। 
छत्तीसगढ़ को संतों ने संतोष और धीरज का पाठ पढ़ाकर सहते हुए शांतिपूर्वक आगे बढऩे का संस्कार दिया है। यहीं मेरा छत्तीसगढ़ है। यह मेरे भिन्न-भिन्न समय पर प्रकाशित आलेखों का संग्रह है। 
मूल रूप में कहानी और उपन्यास लेखन के क्षेत्र में मेरी पहचान है। लेकिन लेखन की शुरुआत में भी विचारपरक आलेखों का सिलसिला लगातार चलता रहा। मेरा पहला विचारोत्तेजक आलेख चालीस वर्ष पूर्व केंसतरा बनाम लिमतरा शीर्षक से देशबन्धु में छपा। तब केंसतरा गांव में सामंतों के द्वारा की गई हिंसा से छत्तीसगढ़ हिल गया था। मैंने तब कहने का प्रयास किया था कि गांव-गांव में सिसकते कमजोर वर्ग की हाय और आह से आसमान गूंजा करता है मगर अति होने पर लोग जान पाते हैं कि छत्तीसगढ़ भी देश के अन्य प्रांतों की तरह सामंतशाही का शिकार रहा है। 
इस लेख की चर्चा भी हुई किन्तु अपने गांव में ही विरोध की गर्मी से मैं झुलस भी गया। यह अच्छा भी हुआ कि कहानी और लेख लिखकर लेखन की शुरुवाती दौर में ही मैं शब्दों की ताकत को पहचान भी सका और आगत के स्वागत के लिए स्वयं को ढंग से तैयार भी कर पाया। इस पुस्तक में विचारोत्तेजक कुछ नये आलेख हैं जो अधिकत नई दुनिया, भास्कर और नवभारत में प्रकाशित हुए। मैं इन समाचार पत्रों के संपादक मित्रों के प्रति आभारी हूं कि उन्होंने लगातार मुझे यथोचित महत्व दिया। एक लेख हंस में रामशरण जोशी के लेख के प्रतिवाद स्वरूप प्रकाशित हुआ। यह बेहद महत्वपूर्ण और चिंताजनक मसले से जुड़ा आलेख हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों के बारे में गलत लेखन की एक कुटिल परम्परा भी चलती रही है। उस परम्परा की खिलाफत भी होती है, लेकिन शातिर लोग माहे-ब-गाहे अपनी चाल चल ही देते हैं। अब छत्तीसगढ़ के गांवों में पढ़ लिखकर शहरों में स्थापित हो चुके बुजुर्ग लेखकों की एक ताकतवर पीढ़ी सीना तानकर आ खड़ी हुई है। इस जानकार और क्षमतावान पीढ़ी के पास अनुभव हौसला और योग्यता भी है। इसलिए अब छत्तीसगढ़ पर टेढ़ी नजर वाले चालाक और कुण्ठाग्रस्त लोग भी अपनी सीमा पहचानने पर मजबूर हो रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ विकास और आशा के दूसरे दसक में प्रवेश कर रहा है। यह पुस्तक ‘मेरा छत्तीसगढ़’ इसे सजाने संवारने में लगे सभी लोगों के सम्मान में प्रस्तुत शब्द-सुमन ही हैं। आशा है, आप सब पसंद भी करेंगे। 
डॉ. परदेशीराम वर्मा 
मो. : 98279-93494

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