Friday, November 4, 2011

विकलाँग श्रद्धा के अनुभव

तिरुमला की पहाड़ियों पर
है बालाजी का स्वर्णमंडित घर
fहंदी की सेवा में पहुँचा बालाजी के द्वार
अखिल भारतीय संगोष्ठी रखी गई थी वहाँ
ताकि अवश्य पहुँचें fहंदी-सेवी
विदेश यात्राओं से लेकर, हिल स्टेशनों, महानगरों
पर्यटन स्थलों पर आयोजन विवशता हैं
fहंदी की दिशा और दशा पर
सम्भव हो पाती हैं
ऐसी ही कुछ जगहों पर बहसें और बातें
जहाँ दिशाहीन और दुर्दशा को प्राप्त
प्रशासनिक अधिकारी एकत्र होकर
कोसते हैं, सरकार, संसद और संविधान को
दरअसल सब अब बधियाये बैल हैं
व्यवस्था में जुते, लतियाये
खुजलाते हैं एक-दूसरे की ख़ाज
मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा
इसी सिलसिले में था बालाजी में
बटोरने कुछ राष्ट्रीय पुरस्कार
उम्र के तकाजे़ में शुरू नहीं हो गया
तीर्थ यात्राओं का सिलसिला
मेरे माक्सZवादी कवि और आलोचक मित्र
न हों कृपया किसी गलतफ़हमी के आसान शिकार

तिरुपति विमानतल पर होटल तक जाने
की गई टैक्सी के चालक से शुरू हुई बातें
कहा मैंने
भाई हरि, तुम तो रहते-बसते हो तिरुपति में
तुम्हारी दिनचर्या में शामिल होगा
सानिध्य बालाजी का
धर्म की राजधानी में बसने का ईनाम
दर्शन रोज का काम

धीरे से कहा उसने
गंगा के किनारे रहने-बसने वालों के लिये
क्या कम हो जाती है गंगा की महिमा
क्या उन्हें भी नहीं होता होगा
गंगा स्नान का वही स्फुरण
वही जो कन्याकुमारी और काश्मीर से
जलपाईगुड़ी और जोधपुर से
काशी स्नान करने वालों को होता होगा

थोड़ी ख़ामोशी के बाद कहा उसने
शाम को चलिये तिरुमला
आज ही कर लीजिये दर्शन
टालिये मत कल-परसों पर
हवाई-यात्रा में क्या थकान
आज विशेष दिन है

पूछा मैंने
क्या विशेष दिन है आज
कहा उसने बड़ा सौभाग्य है आपका
गुरुवार को ही होते हैं नेत्र दर्शन
वह भी साँध्य समय
याने बिना ऋंगार के करिये दर्शन प्रभु जी के
सर्वांग दर्शन, बिना सजे-धजे
बिना सोने और फूलों से लदे
अपनी रचना मानव जैसे
सामान्य बाला जी के दर्शन

दर्शन की टिकट का टोटा पड़ गया
किसी कीमत पर
सम्भव नहीं हो रहा था प्रवेश पाना
काम आई विकलांगता, शायद पहली बार
बिना ज़ेब ढीली किये
प्राथमिकता से मैं पहुँच गया अंदर
यह जुगत बताई थी टैक्सी वाले हरिभाई ने
अच्छा सेल्स्मैन था वह तिरुपति का

लगा सोचने मैं
वे बाहर से प्रस्तर के हैं
और मैं भीतर से
मेरे भीतर का प्रस्तर लगा था पिघलने
अनुभूत कर लाखों लोगों की श्रद्धा असीम
याद आने लगे जैनेन्द्र कुमार
और उनकी रचना ‘रामकथा’

फर्श के पत्थर चिकने हो गये थे
भक्तों की चरण-रज से
याद आये बरबस
बड़े कवि विनोद कुमार शुक्ल
जिन्होंने देखे थे राजिम में
ठहर गये राजीव लोचन के
घिसे हुये पँजे पैरों के
भक्तों ने अपने सिरों से
चिकने कर दिये प्रभुओं के पाँव

कहीं नहीं लिखा था ‘छूना मना है’
भित्तियों पर उकेरी मूर्तियों पर फेरा हाथ मैंने
मिलाये वस्तुतः उन शिल्पियों से हाथ
जिन्होंने सजाया था
ईश्वर के इस घर को
अपनी बेजोड़ कला और अथक् परिश्रम के साथ
सोने के पत्तरों में छिप गये होंगे
उनके स्वेद-कण
चमकते होंगे आज भी नायाब मोतियों से
सोने के पार देखने की
जब ताब होगी मेरी आँखों में
दिख पड़ेंगी वे, अनमोल पसीनों की बूँदें

अपार जनसैलाब
जैसे समुद्र पर पछाड़ खा रही हों लहरें
सन्यासियों के लघु संस्करणों जैसे
छोटे-छोटे बच्चों के घुटे सिर
उन्हें सम्भालती माँयें
भीड़ के थपेड़ों पर बहती माँयें
उतनी ही सतर्क थीं
जैसे रक्खी हुई हों उनको
अभी भी गर्भ में

जय जयकारों के बीच
भावों के थपेड़ों पर बहता
पहुँचा मैं बिल्कुल गर्भगृह के बाहर
एक नौजवान भावों से भरपूर
जोर-जोर से हिला रहा था
अपनी बूढ़ी माँ के हाथों से
मिलाकर अपने हाथ
कितने सपने, अरमान कितने
न जाने संकल्प कितने पूरे हुये होंगे उसके

सोचता हूँ मैं
घर से तिरुपति तक कैसे लाया होगा वह
अपनी माँ को
और यहाँ भीतर गर्भगृह तक
वैसे ही जैसे कभी
माँ लाई थी उसे अपने गर्भगृह में
सँजोये कितने सपने, अरमान कितने

और फिर तिरुपति बालाजी के रचे
इस भौतिक मायावी संसार में
निहारा होगा जब उसने
अपने इस बेटे को पहली बार
और कुछ नहीं देखा होगा
अपने आसपास को

कहाँ देखा उस प्राप्त क्षणाँश में नौजवान ने
एक बार भी बालाजी को
मैं भी माया में रम गया
नहीं पाया निहार बालाजी को
क्या देखना इस प्रस्तर को
जो मुझसे भी अधिक है अचेतन
देखा मैंने
स्वयं श्रीकृष्ण ही आये थे
अपनी क्लांत, वृद्धा यशोदा को लेकर
विष्णुपति के द्वार

साक्षात दर्शन के बाद
लग गये घसिटते पैर प्रसाद की कतार में
कहा किसी ने
आपको लाइन में लगने की क्या जरूरत
अलग खिड़की की है व्यवस्था
व्यवस्था ने समझी है विकलाँगों की विवशता

मिले शुद्ध घी में सराबोर दो लड्डू
रख लिये सम्हाल कर मैंने भिलाई बिरादारी के लिये
याद आई छत्तीसगढ़ी कविता
जगन्नाथ के भात को
जगत पसारे हाथ
यहाँ भी प्रसाद में मिला
दही मिला गर्मागर्म भात
कुछ विदेशी बालायें और पुरूष
असमंज़स में थे कि क्या करें इस प्रसाद का

कहा मैंने
‘जस्ट टेस्ट इट’
उन्होंने फिराई जीभ दोने पर
और फिर मुझसे भी जल्दी
खाली कर दिया दोना

देखी साँध्य आरती पारम्परिक विन्यास में
कुछ चीज़ें हैं जो कभी नहीं बदलतीं
पूर्णिमा, अमावस, सूर्योदय-सूर्यास्त सी
याद आई
मथुरा में कभी देखी
जमुनाजी की साँध्य आरती

बाकी है बहुत कुछ अभी भी
भारतीय संस्कृति के भग्नावशेषों में
कीर्ति की विरुदावलियों के पक्ष में
समय की अदालत में साक्षी के लिये
बचा है अभी भी बहुत कुछ
मसलन तिरुपति के दरबार में पहुँचा
माँ को लेकर श्रवण
टैक्सी वाला हरिभाई

हमारी भारतीयता के ये आधार स्तम्भ
उतने ही मज़बूत, पक्के और समय-जीवी हैं
जैसे दिल्ली में अशोक की मीनार
और छत्तीसगढ़ में पक्की ईंटों से बना
ईश्वर का एक और घर
सिरपुर में अभी तक है जो
अविच्छिन्न खड़ा हुआ

बेटी की बेटी के लिये

बेटी की बेटी के
जन्म दिन पर
सोचा बाटूँ अपना सुख
अपनी कलम से

कलम साथी है
वैसे ही जैसे रहता है साथ
सुख का, दुःख का
आती-जाती श्वाँस का
जुड़ती-बिखरती साँस का

बेटी होती है किरन, भोर की
ज़िन्दगी के छाज़न से
उतरती है सुख सी
गोद में समेटने पर
लगता मानो भर लिया है
माँ को अंक में

छोटी सी दमकती
दीप-शिखा होती है बेटी की बेटी
आँगन में तुलसी के चौरे पर
पूजा घर को बिखेरते उसके नन्हे हाथ
सुगढ़ता से गढ़ने लगते
फिर-फिर मेरा छोटा सा संसार

घोसले के मुँह पर ही मिलती
हमेशा हाथ में लिये पानी का गिलास
छीनने सा पकड़ती है बस्ता-थैला
जानती है, पर मानती नहीं
उसे देखकर ही बुझ जाती है
उसके नाना की प्यास

किरन वही भोर की
बदलती जाती चपला में
हिमालय से भी
लगने लगती ऊँची / वही बेटी
जब होने लगती है ऊँची

नहीं जानते कैसा होगा
उसका घर-संसार
कैसा होगा उसका जीवन
कैसी देख-रेख

कैसी करूँ प्रार्थना अगम से
इतनी कोमल, इतनी लाड़ली है
मेरी बेटी की बेटी
नहीं डालना चाहता / मन से
उस पर आर्शीवाद तक का भार

होने न होने का प्रश्न

हे ईश्वर!
तुम तो थे / तुम हो भी / और रहोगे भी
हम भी थे / हम हैं भी / और रहेंगे भी
किस हिसाब से किसको-किसको
क्या-क्या कुछ-कुछ बटता है
तुम सर्वज्ञ / हम अल्पज्ञ
हे ईश्वर! कुछ तो समझाओ

ज़िन्दगी समतल है / ज़िन्दगी पहाड़ है
ज़िन्दगी सरल है / ज़िन्दगी गरल है
हे सरताज सुरों के / हम बहरे-गूँगों के लिये
भले भरा हो पेट गले तक
कुछ तो गाओ
हे ईश्वर! कुछ तो बहलाओ

क्यों बात-बात पर / बिना बात पर
होती है तक़रार नींद से / रात-रात भर
जब निश्चित है जनम / और मौत भी
क्यों जाते हैं लोग / बिना मौत भी
कुछ न कुछ तो दो सफाई
हे ईश्वर! सूचना अधिकारी का नाम-पता बतलाओ

बात जरा सी / साँस जरा सी
बिना हमारे / तुम आखिर हो क्या जी
अमृत पीकर तुम जी न पाये
जहर मिला / हम मर न पाये
तुम्हारी धरती पर / हम बदस्तूर सवार जी
हे ईश्वर! अब भी तुम हो क्या जी

लेखक

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