Wednesday, November 2, 2011

प्रकृति विलगा

थोड़े बड़े मकान की लोभ मैं
अपना थोड़ा छोटा सरकारी क्वार्टर
बदल लिया मैंने
छूट जाता है बहुत सा अतीत
वर्तमान की दौड़ में भविष्य के दॉंव में
भविष्य की चाह में
ऑंगन में फलता अनार रह गया पीछे
कीड़े खा जाते थे फल
हम तोड़ नहीं पाते थे
कुछ लगाव सा था उस अनार के पेड़ से
छूट गये काफी लम्बे और लगभग घर की पहचान बन चुके
ऊंचे पूरे युक्तिगत और सदाबहार ‘अशोक’
अशोक छूट गया पीछे
बहुत लिपटीं बेंतें गुलाब की
बोगन बेलिया और चमेली
मधुकामिनी और रातरानी
कुछ ज्यादा ही खिलने से लगे थे
रोकना चाहते थे सब
विदा किया सबने
मौन शुभकामनाओं की गंध दान कर
नये घर में भी बड़े-बूढ़े से आम
नीम और जामुन मिले
चला था बुद्ध बनने
बन कर सिद्धा थे लौट गया वापिस
कविता के पास
सुनहरे भविष्य को ठीक से पालने
कोई पेड़ काटे
मुझे लगता है
यह सटीक
प्रमाण है मेरी हत्या का
मेरे परिवार
समाज
और देश की हत्या
लगता जैसे पृथ्वी को कुतरने लगा है कोई
काटने लगा है जीवन की जड़
पेड़ काट कर
कुछ काटने भी पड़ते हैं
जिनका काटा जाना एक जरूरी
संघर्ष की तरह
लाजिमी है शायद
गलती से कर्मइहॉं
ने काट दिया एक अचीन्हा
न फल
न फूल मेरे लिये
अपरिचित पेड़
एक उड़िया सयाना
ठीक उसी तरह
नमूद हुआ मेरे सामने
जैसे कि शोक में बैठने
आया मेरे घर
यह बताने कि एक बूढ़े पेड़ की
तरह वह है अभी भी
मैं छोटा न करूं दिल
कहा उसने
बाबू औषधि का पेड़ था यह
हवा को शुद्ध करने वाला
सबसे कारगर सयाना
इसका औषधिक उपयोग
जानने वाला जाने
औषधियों का परिवार में
बड़ा मान है इस पेड़ का
मेरा दुःख दुगना हो गया
काटा जा रहा है वो
जिसका अतिशय जरूरी है रहना
बने रहना
चार-पॉंच सदियों जैसा तना बाकी था
सयाने उड़िया के साथ
मैने उसे अपनी चिन्ताओं व
प्राथमिकताओं की निगरानी में ले लिया
बड़ी जतन हुई
उसका किया गया ईलाज
आश्चर्य तने से फूटे पॉंच बाहू
आपस में एक दूसरे की तरफ मानों जैसे मूँह किये हों
अशोक चक्र के शेर आग में अशोक की
अपनी एक प्रिया मित्र के कहा मैने
जानती हो
एक तोता लाया हूँ मैं
बिल्कुल सीधा बैठा रहता है
उन पॉंच बाहुओं के बीच
हमारी कल्पना में जैसा बैठा हो
कुछ हमारी चाहत का संसार
हमारी सोची दुनिया
दुनिया जैसी दुनिया उसने कहा
एक बात कहूँ
बुरा तो नहीं मानोगे
उसे बांध कर मत रखना
मुझे सचमुच बुरा लगा
कहा मैंने हम बंधनों के खिलाफ ही खड़े हैं
हम पंछी को क्या बॉंधेगे
वह कला है
किसी फुटपाथ पर मेहनत से
ढालता है तोता
मिट्टी से लगता है रंग प्रकृति से चुन चुन कर
ऊपर वाले के तोते से
ज्यादा जीता है नीचे वाले का तोता
पर सुरक्षित बने रहने की बड़ी कठिन शर्तें हैं
पंछी हो पर
पर नहीं फड़फड़ाना
जब हम देखें
एक सी मुद्रा में अटेन्शन नजर आओ पंछी हो
पर मुंडी नहीं हिला सकते
ऑंखें नहीं मटका सकते
अपने प्रेम का ककहरा
नहीं गुनगुना सकते
इतना रोया आसमान
धुल गया तोता
पॉंच बाहुओं के बीच संरक्षित
किले में सजा हुआ
fसंहासन पर राजसी मुद्रा में बैठा हुआ
बदरंग हो गई उसकी पहचान
गरीबों की कलाओं पर
गरीबों की मल्कियतों पर
अक्सर बरस जाता है जब देखो तब आसमान
मैं ओलों की मृत देह
जब बरस रही थी
जाकर उठा लाया तोते को
ले लिया कलम की सुरक्षा में तलाश है
फुर्सत की
उस कलाकर की
जिना कच्चा पर
पक्का ठिकाना मालूम है मुझे
हमेशा किसी फुटपाथ पर
जहॉं खूब फिरती है जनता
रकम-रकम की जैसे ही मिलेंगे
कलम और रंग तैरेंगे श्रम के सरोवर में
गोद भर जायेगी फिर
उन पॉंच बाहुओं वाले शिशु सयाने पेड़ की ।

लूले पत्थर

जिन्दगी भर
जिन्दगी के पैरों तले ही
रहता है पत्थर

जिन्दगी पत्थर में
भरती रहती है
भरपूर जिन्दगी
जिन्दगी भर

पत्थर पड़ जाने के बाद
नहीं रह जाती जिन्दगी, जिन्दगी
कहते हैं पत्थर के नीचे
कुलबुलाती रहती है
ताजिन्दगी जिन्दगी

सुना है,
बावक्त कयामत
उठेगी जिन्दगी
रूबरु होनेे उसके
जो कभी रूबरु नहीं हुआ
किसी के

सोचता हूँ मैं
कयामत के वक्त
कहाँ होगा पत्थर
जिन्दगी के नीचेे या
जिन्दगी के ऊपर

पत्थरों को तराशने वालों ने
नहीं सोचा कभी
पत्थरों के बारे में
पत्थरों की पनाह में
जागती-सोती
जिन्दगियों के बारे में

पत्थरों को जिन्दगी के साथ
कायनात बख्शने वाले ने भी
कहाँ सोचा
कहाँ होंगे पत्थर
कयामत के वक्त
ता-कयामत जिन्होंने
उठाई है जिम्मेदारी
जिन्दगी और मुर्दानगी में
फर्क जताने की
जिन्दगी को जिलाने की
मौत को दबाने की

कयामत के दिन पूछेगा पत्थर
पकड़ कर दामन, खुदा से
बता कयामत के बाद
मेरी जगह है कहाँ?
अगर हाथ होते तो पत्थर
तार-तार कर देता गरेबाँ
कयामत के दिन
जिन्दगी, मौत और खुद को
बनाने वाले का
स्वयं को कहीं रूपोश रख
दुनिया को चलाने वाले का

लेखक

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