Sunday, October 23, 2011

आवश्यकताओं का समानुपात

सब कुछ होता जाता है शान्त
शाम के साथ / धीरे-धीरे
इतना शान्त कि
पड़ने लगती है सुनाई
आवाज सन्नाटे की

देर रात
घर का दरवाजा खोलता हूँ मैं
कुछ देर टहलने बाहर
सन्नाटे के साथ
मेरे भीतर के शोर को
कुछ तो मिले संगत / सन्नाटे की

बरामदे में लेटा कुत्ता
हो जाता विस्थापित
मेरी मात्र आहट से
पहले भोंकता था
फिर कूकने लगा
अब हट जाता है खामोश

एक झेंप महसूस करता
चेहरा मेरा
टोकता ज़मीर
आखिर कर दिया ना उतना ही बड़ा कुकृत्य
जितना करती है एक हवेली
एक बगीचे के लिये

घर की व्यवस्था में
जोड़ी मैने एक उपधारा
रात्रि को कोई भी न खोले
बारबार मुख्य दरवाजा
नई पीढ़ी तुरन्त सुर में आई
जरूरत में भी नहीं?
मैंने कहा - जरूर
जरूरत हो / तब ही

आवश्यकताओं का समानुपात है एक अनिवार्यता
अपनी आवश्कताओं के साथ
दूसरों की आवश्यकताओं का जितना ख्याल
उतनी ही सुसंस्कृत होती है सभ्यता

हर किसी को मिलनी चाहिये
दुनिया में उसकी गुफा
उसका कोना
और उसका होना

बुलबुलों में कैद हम सब


साबुन के बुलबुले
अब फैल गये आकाश तक
अपने-अपने बुलबुलों में कैद
देख-परख रहे हैं
अपने-अपने रंगों की दुनिया
हम सब / सब के सब

बचपन में जब-तब / गाहे-बगाहे
फूट जाते थे बुलबुले
आँखों से ओझल हों
पहले इसके / शुरू हो जाते थे
बनाने के उपक्रम / एक और बुलबुला सही

अब फेफड़ों का दम निकलता है
दर्शन सहज था कभी
अब प्रदर्शन / दिग्दर्शन का जमाना है
बुलबुले जितना ही
जमाने का ठिकाना है

कितनी बार
कितनी-कितनी बार /
तिनके बटोरे कोई
पंख थक जाते हैं
बुलबुलों से
धरा से उठते हम गगन तक
बुलबुलों से बिखर जाते हम

अभी सकून है
बुलबुले के अन्दर
जो हमारी रचना है
कितने भी होते जाओ भारी-भरकम
क्या बचना है!

बचाओ साँसें
इतनी मज़बूत
बनाते रह सको
बुलबुलों के बाद बुलबुले
बचाओ हिम्मत / जुटाओ हौसला
रख सको तो रखो / ढँका हुआ
अपने बुलबुलों से
किसी और का बनाया हुआ
बचपने का
साबुन का बुलबुला

गत गढ़ता है आगत


इतिहास से सबक
लेने की कला
नहीं सीख पाये आज तक
इसीलिये न / कहते हैं
दोहरा जाता है / स्वयं को
इतिहास

मैंने तो नहीं मांगी कभी
शान्ति
कैसा लगेगा शान्त समंदर
झींगुर बिन रात / और जंगल
शान्त

कौन मानेगा
किलकारियों ्र खिलखिलाहटों
से होता है प्रदूषण
गूंगी कर दोगे क्या
चिड़िया

अतीत की आवाजें
रखनी होंगी बचाकर
प्रगति के चमचमाते पथों की
पूर्वज हैं
पगडंडियाँ

जाने कब मिलेगी मंजिल
कदम की पहली धमक
रखे साथ में
मानो / और जानो
मंत्र

इतिहास के झरोखे से
सीखे झांकना
जमे रहें पाँव
पृथ्वी पर / आज की
ज्यादा दिखेगा साफ
कल आने वाला
चाँद

गत गढ़ता है आगत को
जीवन जलता है
स्वागत को
बात रहे / और साथ रहे
रात बहे / और तैरे दिन
देह में जैसे
आँख


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...


लेखक

अशोक सिंघई (31) कविता संग्रह (31) समुद्र चॉंद और मैं (30) कहानी संग्रह (12) आदिम लोक जीवन (8) लोक कला व थियेटर (8) Habib Tanvir (7) उपन्‍यास (5) गजानन माधव मुक्तिबोध (5) छत्‍तीसगढ़ (5) नेमीचंद्र जैन (5) रमेश चंद्र महरोत्रा (5) रमेश चंद्र मेहरोत्रा (5) पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी (4) वेरियर एल्विन (4) व्‍यंग्‍य (4) गिरीश पंकज (3) जया जादवानी (3) विनोद कुमार शुक्‍ल (3) अजीत जोगी (2) अवधि (2) अवधी (2) गुलशेर अहमद 'शानी' (2) जमुना प्रसाद कसार (2) डॉ. परदेशीराम वर्मा (2) डॉ.परदेशीराम वर्मा (2) परितोष चक्रवर्ती (2) माधवराव सप्रे (2) मेहरून्निशा परवेज़ (2) संस्‍मरण (2) W. V. Grigson (1) अनिल किशोर सिन्‍हा (1) अपर्णा आनंद (1) आशारानी व्‍होरा (1) कैलाश बनवासी (1) चंद्रकांत देवताले (1) चम्पेश्वर गोस्वामी (1) जय प्रकाश मानस (1) डॉ. भगवतीशरण मिश्र (1) डॉ.हिमाशु द्विेदी (1) दलित विमर्श (1) देवीप्रसाद वर्मा (1) नन्दिता शर्मा (1) नन्‍दकिशोर तिवारी (1) नलिनी श्रीवास्‍तव (1) नारी (1) पं. लखनलाल मिश्र (1) मदन मोहन उपाध्‍याय (1) महावीर अग्रवाल (1) महाश्‍वेता देवी (1) रमेश गजानन मुक्तिबोध (1) रमेश नैयर (1) राकेश कुमार तिवारी (1) राजनारायण मिश्र (1) ललित सुरजन (1) विनोद वर्मा (1) विश्‍व (1) शकुन्‍तला वर्मा (1) श्‍याम सुन्‍दर दुबे (1) संजीव खुदशाह (1) संतोष कुमार शुक्‍ल (1) सतीश जायसवाल (1) सुरेश ऋतुपर्ण (1) हर्ष मन्‍दर (1)

संबंधित संग्रह